Wednesday, July 1, 2026

झारखंड हाई कोर्ट ने ‘No Work, No Pay’ का आदेश किया रद्द; कहा: विभाग की अवैध कार्रवाई का खामियाजा नहीं भुगतेंगे कर्मचारी

रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के सेवा कानूनों और सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि विभाग किसी कर्मचारी को गलत या अवैध तरीके से नौकरी से निकालता है, तो उसका खामियाजा उस कर्मचारी को नहीं भुगतना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारी अमरेश कुमार झा को बड़ी राहत देते हुए विभाग के उस मनमाने आदेश को सिरे से रद्द कर दिया, जिसमें उनकी बर्खास्तगी अवधि को नो वर्क, नो पे ( काम नहीं तो वेतन नहीं ) घोषित कर पिछले 6 साल के वेतन और अन्य लाभों पर रोक लगा दी गई थी।

“12 हफ्ते में दें पूरा बैक वेज”- हाई कोर्ट 

सुनवाई के दौरान अदालत ने नियोक्ता और सरकारी विभागों की मनमानी पर तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने अपने फैसले का मुख्य आधार इन तीन महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को बनाया:

  • अवैध आदेश का प्रभाव शून्य: कोर्ट ने कहा कि जब अदालत मूल बर्खास्तगी आदेश को ही अवैध घोषित कर चुकी है, तो कानून की नजर में यह माना जाएगा कि कर्मचारी कभी सेवा से बाहर गया ही नहीं था और वह लगातार अपनी ड्यूटी पर तैनात था।
  • विभाग की गलती की सजा कर्मचारी को क्यों?: कर्मचारी काम पर इसलिए नहीं आ सका क्योंकि विभाग ने उसे अवैध रूप से हटाकर काम करने से रोका था। ऐसी स्थिति में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत कतई लागू नहीं होता।

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  • सबूत का जिम्मा नियोक्ता पर: अदालत ने साफ किया कि विभाग को यह साबित करना होगा कि बर्खास्तगी के दौरान कर्मचारी कहीं और लाभकारी रोजगार में था। यदि विभाग यह साबित नहीं कर पाता, तो उसे कर्मचारी को पूरा बैक वेज और सभी सेवा लाभ देने ही होंगे।
  • 12 हफ्ते की डेडलाइन: हाई कोर्ट ने सड़क निर्माण विभाग को कड़ा निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता अमरेश कुमार झा को अगले 12 हफ्तों के भीतर उनके सेवा से दूर रहे कार्यकाल का पूरा वेतन और अन्य सभी वित्तीय लाभों का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

क्या था पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट तक हारी सरकार

यह पूरा कानूनी विवाद साल 2017 से शुरू हुआ था, जब सड़क निर्माण विभाग के कर्मचारी अमरेश कुमार झा को 13 नवंबर 2017 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद न्याय की लंबी लड़ाई शुरू हुई। अदालत ने साल 2021 में ही विभाग की इस एकतरफा कार्रवाई को अवैध पाते हुए रद्द कर दिया था और अमरेश झा को सेवा में पुनर्बहाली का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देने के लिए राज्य सरकार पहले एलपीए ( LPA ) और बाद में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी ( SLP ) लेकर गई। लेकिन सरकार की अपीलें हर जगह खारिज हो गईं।

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कानूनी मोर्चे पर चारों खाने चित होने के बाद विभाग ने नवंबर 2023 में अमरेश झा को नौकरी पर वापस तो रख लिया, लेकिन चालाकी दिखाते हुए 13 नवंबर 2017 से 24 नवंबर 2023 तक की लगभग 6 साल की अवधि को ‘नो वर्क, नो पे’ घोषित कर दिया। इसी आदेश को अमरेश झा ने दोबारा हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां अब उनकी बड़ी जीत हुई है।

इस फैसले के आने के बाद अब उम्मीद लगाई जा रही है कि राज्य के उन तमाम कर्मचारियों को संबल मिलेगा जो विभागों की मनमानी या गलत बर्खास्तगी का शिकार होकर वित्तीय नुकसान झेलते हैं।

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