Tuesday, July 21, 2026

कोर्ट ने ठहराया दोषी, फिर भी कुर्सी बरकरार! रघुनंदन उरांव केस ने खोली पोल

रांची: झारखंड में विकास की गाड़ी जिन कंधों पर टिकी है, उनमें से एक कंधा कानूनी रूप से ‘दागी’ निकल चुका है। दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में तैनात अभियंता रघुनंदन उरांव, जिनके पास वर्तमान में करीब 300 करोड़ रुपये की सरकारी योजनाओं की निगरानी और विभागीय जिम्मेदारी है, उन्हें अदालत ने धोखाधड़ी के मामले में जेल की सजा सुनाई है लोहरदगा सीजेएम (CJM) कोर्ट के आदेश की कॉपी ने सरकारी गलियारों में खलबली मचा दी है। रघुनंदन उरांव को N.I. Act की धारा 138 के तहत चेक बाउंस और वित्तीय हेराफेरी का दोषी पाया गया है। कोर्ट ने रघुनंदन उरांव को 6 महीने की जेल और 3.50 लाख रुपये का जुर्माना भरने का हुक्म दिया है।

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क्या है पूरा मामला?

मामला निजी लेन-देन में धोखाधड़ी और जानबूझकर बाउंस चेक देने का था, जिसे अदालत ने ‘सामाजिक-आर्थिक अपराध’ की श्रेणी में माना है। सवाल रघुनंदन उरांव की निजी ईमानदारी पर तो है ही, लेकिन बड़ा सवाल विभाग की कार्यशैली पर भी है। एक अधिकारी जिसे अदालत ‘दोषी’ मान चुकी है, वह 5 सहायक अभियंताओं और 25 कनीय अभियंताओं की फौज का नेतृत्व कैसे कर रहा है? 300 करोड़ के भारी-भरकम बजट वाली योजनाओं की जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में कैसे है, जिसकी वित्तीय साख (Financial Integrity) कानून की नजर में शून्य हो चुकी है?

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नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी कर्मचारी को जेल की सजा होने या गंभीर आपराधिक मामले में दोषी पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई और निलंबन की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन रघुनंदन उरांव के मामले में ऐसा लगता है कि ऊंची पहुंच ने कानून और नियमों के बीच दीवार खड़ी कर दी है। क्या विभाग को इस बात की खबर नहीं है, या जानबूझकर रघुनंदन उरांव को संरक्षण दिया जा रहा है? सरकारी खजाने की सुरक्षा और विकास कार्यों की गुणवत्ता पर अब सवालिया निशान लग गए हैं। अगर एक सजायाफ्ता अधिकारी जनता के करोड़ों रुपयों का हिसाब रखेगा, तो पारदर्शिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

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एयर नाऊ स्पेशल

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