एयरनाउ डेस्क : एक प्रेमी है जो अपनी प्रेमिका से कहता है कि मैं तुम्हारे लिए दो दिशाओं को एक कर सकता हूँ, दिशाओं की तो बात अलग है तुम चाँद तारे बोलो वो भी तुम्हारे कदमों में लाकर रख सकता हूँ। बेचारी उस प्रेमिका को ये पता है कि उसके शाहज़ादे के वादे कभी पूरे नहीं होने वाले। लेकिन भला जो लकीर समय ने एक बार खींच दिया है, उसे कहा मिटाया जा सकता है। समय का खींचा हुआ ये लकीर प्रेम के प्रसंगों में जिस तरह काम करता है उसी तरह राजनीति के प्रपंचों में भी।
Highlights:
Tejashwi Yadav का नौकरी नवजागरण, सपना या सियासी छलावा? | Bihar Election 2025 | The Air Now Show
अन्तर बस इतना है कि राजनीति में प्रेमी की भूमिका राजनीतिक दल निभाते हैं और प्रेमिकाओं की भूमिका में हम यानी की आम जानता होती है। अब ऐसे में प्रेमी कोई वायदा करे और प्रेमिका उसपर विश्वास ना करे तो भैया ख़ाक का प्रेम। अब ये तो तय ही है कि छले तो जाएँगे ही तो सबंधों की नैतिकता का पालन करते हुए प्रेमी के वायदे पर ये सोच भरोसा कर लेते हैं कि चुनाव का हक तो अपने हाथ ही है देख लेंगे अगली बार। बस फिर क्या है हाल उसी कहानी का हो जाना है, जिसमें एक कहावत है, “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, भूलकर उसमें फँसना नहीं” लेकिन ना उस कहानी में ना ही चिड़िया मानती है ना इस कहानी में प्रेमिका मानेगी। फँसना तो तय है।
तेजस्वी का दावा: 20 महीने में हर घर में सरकारी नौकरी
बिहार की राजनीति में चुनाव के समय वादों की बाढ़ आ जाती है। तेजस्वी यादव ने गुरुवार को एक बड़ा ऐलान किया कि बिहार में नौकरियों का नवजागरण होगा। उन्होंने कहा कि जो भी परिवार सरकारी नौकरी से वंचित है, उन्हें एक नया कानून बनाकर अनिवार्य रूप से नौकरी दी जाएगी। सरकार बनते ही 20 दिन में ये कानून बनेगा और 20 महीने में ऐसा कोई घर नहीं बचेगा जहां सरकारी नौकरी न हो। ये सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन सोचिए, ये वादा कितना व्यावहारिक है। राजनीति में ऐसे दावे तो आसानी से किए जाते हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने की हकीकत अलग होती है। ये ऐसा लगता है जैसे कागज पर सपने लिख दिए जाएं, लेकिन जमीन पर उतारने का रास्ता न दिखे।
Bihar NDA में सीट बंटवारा फाइनल? Chirag, मांझी और कुशवाहा की मांगों पर बनी सहमति! | The Air Now Show
तेजस्वी ने अपनी बात को मजबूत करने के लिए 2020 के चुनाव की याद दिलाई। तब उन्होंने कहा था कि सरकार बनते ही 10 लाख नौकरियां देंगे। उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूछा था कि ये कैसे संभव है, पैसा कहां से आएगा। उन्होंने तंज में कहा था कि क्या अपने पिता से लाएंगे। तेजस्वी ने जवाब दिया कि सरकार के दो साल बाद भी नौकरियां नहीं मिलीं। ये बात सही है, क्योंकि बिहार में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। लेकिन अब वे कहते हैं कि तेजस्वी जो बोलता है, वो करता है। 17 महीने की अपनी सरकार में कुछ नौकरियां दी गईं, ये ठीक है, लेकिन वो काफी नहीं थीं। अब 20 महीने में पूरे राज्य को नौकरियों से भर देना, ये तो जैसे आसमान से तारे तोड़ने जैसा है बिल्कुल उस प्रेमी की तरह जिसकी बात हमने पहले की थी। खैर एक समस्या ये भी है कि वादे बड़े-बड़े होते हैं, लेकिन सिस्टम की कमियां उन्हें खोखला बना देती हैं।
आंकड़े बताते हैं – इतना आसान नहीं
बिहार की स्थिति को देखें तो बात और साफ हो जाती है। यहां कुल घरों की संख्या कितनी है? हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 के सर्वे में बिहार में कुल 2.76 करोड़ घर हैं। विकिपीडिया के अनुसार, 2023 की बिहार जाति जनगणना में राज्य की आबादी 13.07 करोड़ थी, और औसतन हर घर में 5 लोग होते हैं, जो घरों की संख्या को करीब 2.61 करोड़ बनाता है। 2025 तक ये संख्या थोड़ी बढ़कर लगभग 2.68 करोड़ हो सकती है. अब तेजस्वी का वादा है कि हर घर में कम से कम एक सरकारी नौकरी होगी। लेकिन वर्तमान में बिहार में सरकारी नौकरियां कितनी हैं? नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या लगभग 12 लाख के आसपास है, जिसमें राज्य और केंद्र सरकार के कर्मचारी शामिल हैं। अगर मान लें कि 40-50 प्रतिशत घरों में पहले से एक सरकारी नौकरी है, तो बाकी 1.3 से 1.4 करोड़ घरों को नई नौकरियां देनी होंगी। ये संख्या इतनी बड़ी है कि इसे पूरा करना किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं लगता। सवाल ये भी है कि जहां मौजूदा सिस्टम में हजारों पद खाली पड़े हैं, वहां करोड़ों पद कैसे बनेंगे।
बजट और सिस्टम पर बड़ा सवाल
अब पिछले पांच सालों की बात करें, यानी 2020 से 2025 तक। एनडीए सरकार ने कितनी सरकारी नौकरियां दीं? तो टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 तक सरकार ने 5 लाख नौकरियां दी हैं, और 2025 तक 12 लाख का लक्ष्य है। इम्प्रेसिव टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा, पुलिस और स्वास्थ्य जैसे विभागों में बड़ी भर्तियां हुई हैं, लेकिन कुल मिलाकर 5 लाख के करीब। नीतीश कुमार ने कहा कि 10 लाख का लक्ष्य था, लेकिन अब 12 लाख कर दिया गया है, जिसमें से 5 लाख पहले ही दिए गए। बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन और अन्य एजेंसियों के माध्यम से 2020-21 में शिक्षकों की 1.7 लाख भर्तियां, 2022 में पुलिस के 21 हजार पद, 2023-24 में स्वास्थ्य में 13 हजार, और कुल मिलाकर 3 से 4 लाख के बीच। लेकिन ये संख्या तेजस्वी के 10 लाख के वादे से भी कम है। अब वे 1.3 करोड़ नौकरियां कहां से लाएंगे? बात ये है कि जब पांच साल में मुश्किल से 5 लाख पद भरे गए, तो 20 महीने में करोड़ों कैसे? क्या नए विभाग बनेंगे या पुराने को बढ़ाया जाएगा?
बेरोजगारी का बोझ और युवाओं का पलायन
सवाल ये भी है कि बिहार में बेरोजगारी की दर क्या है? पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में बिहार की बेरोजगारी दर 3.9 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 3.2 प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में भी 2022-23 के लिए 3.9 प्रतिशत बताया गया है। युवाओं में ये दर 10.8 प्रतिशत तक है, जैसा कि बिहार इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 में कहा गया है। युवा दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। तेजस्वी कहते हैं कि एनडीए ने 20 साल में असुरक्षा और बेरोजगारी दी। ये सही है, क्योंकि विकास के दावे तो हुए, लेकिन नौकरियां नहीं बढ़ीं। अब वे हर घर को नौकरी देंगे। लेकिन सवाल ये है कि बेरोजगारी भत्ता देने की बात करने वाले अब आर्थिक न्याय की बात कर रहे हैं, लेकिन योजना का कोई ठोस ब्लूप्रिंट नहीं है। बहरहाल, आगे बढ़ते हैं.
तेजस्वी ने कहा कि उद्योग लगाएंगे, एजुकेशनल सिटी बनाएंगे, आईटी पार्क, कृषि और डेयरी उद्योग बढ़ाएंगे। ये विचार अच्छे हैं, लेकिन बिहार में निवेश क्यों कम है? इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, 2023-24 में राज्य की अर्थव्यवस्था 9.2 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सिर्फ 5.7 प्रतिशत वर्कर्स को रोजगार देती है। 80 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। 20 महीने में आईटी पार्क? ये तो जैसे सूखे में नदी बहाने जैसा है। वे कहते हैं कि सारा डेटा निकाला है, सर्वे किए हैं। लेकिन जनता को बताएं कि कितने घरों में नौकरी नहीं है? बजट कितना लगेगा? एक सरकारी नौकरी पर सालाना खर्च 5-10 लाख रुपये होता है। 1.3 करोड़ नौकरियों के लिए 6.5 लाख करोड़ सालाना? बिहार का बजट तो द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 के लिए 3.17 लाख करोड़ है। पीआरएस इंडिया की रिपोर्ट में जीएसडीपी 10.97 लाख करोड़ अनुमानित है।तो इसके लिए पैसा कहां से आएगा? केंद्र से या टैक्स से? ऊपर से कर्ज पहले से 3 लाख करोड़ है। चिंता ये भी है कि वादा रोजगार का है, लेकिन बोझ कर्ज का बढ़ेगा।
वादे बनाम योजना : किस पर भरोसा करे जनता?
बिहार की राजनीति वादों से भरी है। लालू यादव के कार्यकाल में रेलवे क्रांति हुई, लेकिन राज्य पिछड़ा। नीतीश के दौर में सुशासन, लेकिन बेरोजगारी वही। तेजस्वी कहते हैं कि जीत का जश्न हर घर में नौकरी से मनाएंगे। लेकिन बात ये है कि जश्न वोटों के लिए होता है और नौकरियां मेहनत से पाई जाती है। वे वादा करते हैं कि 5 साल में साबित करेंगे कि कर्म बिहार है, धर्म बिहारी है। लेकिन 2020 का वादा कहां है? 17 महीने में दी नौकरियां अच्छी थीं, लेकिन कम वादे से कम थी। अब इस बार कहीं जीत गए तो ये बड़ा वादा भी कहीं अधूरा न रह जाए। खैर, तेजस्वी युवा हैं, ऊर्जावान हैं। लेकिन बात योजना से बनेगी वादों और ऊर्जा से नहीं।
लेकिन जैसा की हमने पहले ही कहा कि जानता प्रेमिका की भूमिका में है. ऐसे में देखना ये होगा कि समय की खींची हुई रेखा इस बार और गहरी होगी या फिर वास्तविकता की चादर उसे थोड़ा भी ढकने में सफलता पाएगी. तो अब आज के लिए बस इतना ही. मुझे दीजिए इजाज़त. कल फिर केसी और विषय पर बात होगी.


