न्यूज डेस्क : देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इन दिनों मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR का काम इन दिनों चल रहा है. 4 नवंबर से शुरू हुए दूसरे चरण में पिछले 19 दिनों में 6 राज्यों से कुल 15 बीएलओ की मौत हो चुकी है. जिन राज्यों में यह घटनाएं हुई है, उसमें गुजरात और मध्य प्रदेश में 4-4, पश्चिम बंगाल में 3, राजस्थान में 2 और केरल व तमिलनाडु से 1-1 मौत दर्ज की गई है.
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मध्य प्रदेश में हालात चिंताजनक
सबसे ज्यादा चिंताजनक हालात मध्य प्रदेश में हैं. रायसेन जिले में रमाकांत पांडे नाम के बीएलओ की मौत उस वक्त हुई जब वह चार दिनों से ठीक से सो नहीं पाए थे, रात-रात भर ऑनलाइन मीटिंग्स में उपस्थित रहना पड़ रहा था और टारगेट पूरा न होने पर कार्रवाई की चेतावनी तक मिल रही थी। ऐसे ही एक ऑनलाइन मीटिंग के बाद वे बाथरूम में बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।
दमोह जिले में फॉर्म भरते समय बीएलओ सीताराम गोंड की तबीयत अचानक बिगड़ी और मौके पर ही उनकी मौत हो गई. रायसेन जिले में ही एक बीएलओ, नारायण सोनी पिछले छह दिनों से लापता हैं. परिवार का कहना है कि वह लगातार काम के दबाव में थे. भोपाल में दो बीएलओ कीर्ति कौशल और मोहम्मद लाइक ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक से गिर पड़े और फिलहाल अस्पताल में इलाजरत हैं. कुछ दिन पहले दमोह में सड़क हादसे में भी एक बीएलओ की जान गई थी, और दतिया में एक बीएलओ ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली.
गुजरात में बीएलओ ने छोड़ा सुसाइड नोट
गुजरात में भी हालात अलग नहीं हैं। वडोदरा में कषाबेन नाम की बीएलओ अचानक बेसुध होकर गिर पड़ीं और उनकी अस्पताल में मौत हो गई. सौराष्ट्र में अरविंद बाडेर ने आत्महत्या कर ली और अपनी चिट्ठी में साफ लिखा—“काम नहीं हो सकता।” तापी और खेडा में दो और बीएलओ की हार्ट अटैक से मौत दर्ज हुई है. अहमदाबाद और दाहोद में दो बीएलओ गंभीर रूप से बीमार हैं और अस्पताल में भर्ती हैं.
बंगाल में 3 मौत से बवाल
पश्चिम बंगाल में भी लगातार मौतों की खबरें सामने आ रही हैं। नादिया जिले में रिंकू तरफ़दार नाम की महिला बीएलओ की लाश उनके घर में छत से लटकी मिली। पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला है। परिवार का कहना है कि रिंकू लगातार SIR के भारी काम के दबाव और मानसिक तनाव में थीं। इससे पहले जलपाईगुड़ी में भी एक बीएलओ फंदे से लटकी मिली थी। बंगाल में यह तीसरी मौत है और दूसरा केस जिसमें सीधे तौर पर सुसाइड सामने आया है।
हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद चीफ इलेक्शन कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर SIR को रोकने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि बिना प्लानिंग के, दबाव डालकर किया जा रहा यह काम लोगों की जान के लिए खतरा बन गया है।
बीएलओ ने ट्रेन के आगे कूदकर दी जान
राजस्थान में भी दो बीएलओ अपनी जान गंवा चुके हैं। जयपुर में मुकेश जांगिड़ ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। करौली में एक बीएलओ की मौत हुई। सवाई माधोपुर में एक बीएलओ ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक से अस्पताल में भर्ती हैं। तमिलनाडु और केरल में भी एक-एक बीएलओ की मौत की पुष्टि हो चुकी है। हर जगह कहानी लगभग एक जैसी है, ज्यादा काम का दबाव, लंबी ड्यूटी, टारगेट पूरा होने का डर और मानसिक तनाव।
सबसे बड़ा सवाल- आखिर मौत क्यों?
अब बड़ा सवाल यह है कि इतने बीएलओ क्यों मर रहे हैं? असलियत यह है कि चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया का सबसे ज्यादा बोझ इन्हीं कर्मचारियों पर पड़ता है। इन्हें घर-घर जाकर फॉर्म भरना होता है, देर रात मीटिंग में शामिल होना पड़ता है, ऑनलाइन एंट्री करनी होती है, डिजिटलीकरण करना होता है, और इसके साथ टारगेट पूरा न होने की चेतावनी हमेशा सिर पर बनी रहती है। बीएलओ को न सही वक्त मिलता है, न आराम, न सुरक्षा। और इसी दबाव में कई लोग हार्ट अटैक, ब्रेन हैमरेज, या मानसिक तनाव में आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठा रहे हैं।
चुनाव आयोग की रिपोर्ट
इसी बीच चुनाव आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया कि राज्यों में फॉर्म का डिजिटलीकरण कितना हुआ है। राजस्थान सबसे ऊपर है—60.54% फॉर्म डिजीटल हो चुके हैं। मध्य प्रदेश में 49.42%, गुजरात में 42.88%, बंगाल में 40.18%, तमिलनाडु में 35.86%, और केरल सबसे नीचे है—सिर्फ 10.58% फॉर्म डिजीटल होने में सफल रहे हैं। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे असली मेहनत उन्हीं लोगों की है जो आज अपनी जान की बाज़ी लगाकर इस अभियान में लगे हुए हैं।
एक तरफ आंकड़े, दूसरी तरफ इंसान। एक तरफ टारगेट, मीटिंग, दबाव… और दूसरी तरफ वे परिवार जो अपने पति, बेटों, बेटियों को खो चुके हैं। यह पूरी कहानी हमें एक कड़ा सवाल छोड़कर जाती है—क्या लोकतंत्र को चलाने वाले कर्मचारियों की जान इतनी सस्ती है? क्या वोटर लिस्ट अपडेट करने का काम इतना जरूरी है कि इसमें लोगों की जान चली जाए?
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि SIR का काम अभी भी जारी है। लाखों बीएलओ आज भी इसी दबाव और तनाव में काम कर रहे हैं, और आने वाले दिनों में उनकी सुरक्षा, उनका स्वास्थ्य—यह सब किसकी जिम्मेदारी होगी, यह बड़ा सवाल है। अगर एक फॉर्म डिजीटल होने के लिए एक इंसान की जान जा रही है, तो हमें यह जरूर सोचना पड़ेगा कि हमारा सिस्टम किस दिशा में जा रहा है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है।


