Tuesday, July 21, 2026

SIR : 25 BLO की जिंदगी का जिम्मेदार या मूक दर्शक

देश : ये कहानी है BLO की,Booth Level Officer.एक ऐसा कर्मचारी…जिसका नाम किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं बनता, जिसकी मौत पर कोई बड़ा नेता ट्वीट नहीं करता और जिसकी लाश पर चढ़कर भी सिस्टम अपनी फाइलें बंद कर देता है।” आप यकीन मानिए…सिर्फ पिछली 22 दिनों में,7 राज्यों में 25 BLO की मौत हो गई। सबसे ज्यादा MP = 9,UP–Gujarat = 4-4,और TMC का दावा है कि सिर्फ पश्चिम बंगाल में 34 मौतें हुई हैं। लेकिन सवाल है,आख़िर ये मौतें क्यों हो रही हैं?क्या कोई महामारी फैली है? क्या कोई हादसा हुआ है?इसका जवाब होगा नहीं।

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ये मौतें ‘काम के बोझ’ से हुई हैं। इस देश में ‘ड्यूटी’ अब एक नया शब्द है। जो कई बार ‘मौत’ का दूसरा नाम बन चुकी है। कागज़ों में BLO एक साधारण कर्मचारी होता है।लेकिन असलियत में? वोटर लिस्ट, घर-घर सर्वे, डाटा अपडेट, बूथ निरीक्षण, फॉर्म-6, फॉर्म-7, एप आधारित रिपोर्टिंग, मीटिंग, ट्रेनिंग, साथ-साथ अपनी मूल नौकरी भी करते है..जिस शिक्षक को बिएलओ बनाया गया वो क्लास भी लेता है। क्लर्क है तो ऑफिस ड्यूटी भी निभाता है, सफाईकर्मी है तो सफाई करना भी उसका काम है, स्वास्थ्यकर्मी है तो स्वास्थ्य केंद्र कि जवाबदेही भी तय करनी है…लेकिन सके अलावा BLO की ड्यूटी करनी पड़ती है जिसका कोई समयसीमा नहीं है, 24 घंटे की।किसी भी वक्त।किसी भी मौसम में।किसी भी हालत में उन्हे इसकी ड्यूटी पुरी करनी ही होगी… अभी देश भर में सरकार SIR करा रही और इसका पुरा जिम्मा इन्ही बिएलओं को दिया गया है जो इनकी मौत और FIR कारण बन रहा..

SIR क्या है

अब बात करते हैं SIR की। ये है क्या इसका काम क्या है..Special Summary Revision- SSR या SIR,मतदाता सूची अपडेट करने की वार्षिक प्रक्रिया।कागज़ों में यह ‘सरल प्रक्रिया’ है।लेकिन ज़मीनी हकीकत उतनी ही जटील.. सुबह 6 बजे से फील्ड में घर-घर जाना,एक दिन में 40–50 घरों का डाटा कलेक्ट करना,शाम को ऐप/पोर्टल में फीड करना, रात में 10–11 बजे तक रिपोर्ट करना… अगले दिन फिर वही रूटीन… और इस सबके बीच अधिकारी का मैसेज,आज ही रिपोर्ट चाहिए, वरना कार्रवाई होगी।लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि BLO इंसान है या रोबोट? देश के 12 राज्यों में 51 करोड़ से अधिक मतदाताओं के घर दस्तक दे रहे 5.32 लाख से अधिक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) पर काम के दबाव का आरोप लग रहा है। SIR प्रोसेस के दौरान 22 दिनों में 7 राज्यों में 25 बीएलओ की मौत हो गई है।

सीएम ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया

वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने केवल पश्चिम बंगाल में 34 लोगों की मौत का दावा किया। इन मौतों पर बंगाल, एमपी, राजस्थान, यूपी में सियासत जोरों पर है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग जिला और राज्यों की रिपोर्ट के इंतजार में है। आयोग के सूत्रों का कहना है कि अब तक किसी काम के दबाव से किसी मौत की पुष्टि नहीं हुई है।पश्चिम बंगाल के मंत्री अरुप बिस्वास ने कहा है कि SIR के चलते राज्य में 34 लोगों ने जान दी। सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि इसका उद्देश्य ‘पीछे के दरवाजे से एनआरसी लागू करना’ और डर पैदा करना है।उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में सोमवार को जहर खाकर जान देने वाले बीएलओ व शिक्षक विपिन यादव के पिता सुरेश यादव ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा- बेटे ने मरने से पहले फोन पर कहा था कि एसडीएम और बीडीओ वोटर लिस्ट से ओबीसी मतदाताओं के नाम हटाने और सामान्य वर्ग के नाम बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। मना करने पर उसे निलंबन और गिरफ्तारी की धमकी दी गई थी।

विपिन की पत्नी सीमा ने भी बताया कि अधिकारी आधार न देने वालों का नाम भी जोड़ने को कहते थे। पति बहुत दबाव में थे।26 नवंबर को यूपी के बरेली में बीएलओ सर्वेश गंगवार (47) अचानक से गिर पड़े। अस्पताल में मौत हो गई। उनके भाई योगेश ने कहा- SIR एसआईआर का दबाव है, देर रात तक काम करवाते थे। बीएलओ की मौत इसलिए भी चिंता बढ़ा रही है, क्योंकि अगले साल से देशभर में जनगणना शुरू होगी। उसमें भी सबसे बड़ा बोझ शिक्षकों के ऊपर होगा।
जहां तक एसआईआर को रोकने की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग को इसका वैधानिक अधिकार है। आयोग को यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 324 की धारा 21 के तहत मिला हुआ है। 1952 से अब तक देश में 13 बार एसआईआर हुआ है, लेकिन कभी इस पर इतना बवाल नहीं मचा, जितना इस बार दिखाई पड़ रहा है।

विपक्षी दलों द्वारा एसआईआर के विरोध

रहा सवाल कुछ विपक्षी दलों द्वारा एसआईआर के विरोध का तो उसके पीछे यह भय है कि इस प्रक्रिया की आड़ में उसके वोट बैंक को खत्म किया जा सकता है। बिहार में विपक्षी महागठबंधन की करारी हार से यह आशंका और बलवती हुई है, जहां 65 लाख वोट चुनाव आयोग ने काट दिए थे। हालांकि इस तरह से वोटों का काटा जाना संदेह ज्यादा है, पुष्टिकारक कम। बिहार में महागठबंधन की हार के और भी कई कारण हैं। इसमें दो राय नहीं कि देश में समय-समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण होना चाहिए तथा अवैध, मृत अथवा फर्जी मतदाताओं के नाम हटने चाहिए। क्योंकि मतदान का अधिकार महज एक बटन दबाने का अधिकार नहीं है बल्कि यह देश के हर नागरिक को मिला वह राजनीतिक अधिकार है, जिससे वह अपने शासकों को चुन या खारिज कर सकता है।

राजनीतिक दल अपने सत्ता स्वार्थों के चलते कई ऐसे नामों को जोड़ने में नहीं हिचकिचाते जो अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं। ऐसे भी नाम मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हैं, जो कहीं और जाकर बस गए या भगवान को प्यारे हो चुके हैं। इस लिहाज से वोटर लिस्ट की सफाई चुनाव आयोग का लोकतांत्रिक कर्तव्य है।यही कारण है कि मतदाताओं के स्तर पर एसआईआर का कहीं कोई विरोध नहीं है। लेकिन इस बार एसआईआर का जो अमानवीय पक्ष उभर कर आया है, वह बहुत चिंताजनक और समूची प्रक्रिया पर पुनर्विचार की मांग करता है।

हालांकि चुनाव आयोग का एक तर्क यह हो सकता है कि पूरे देश में 5 लाख 30 हजार बीएलओ एसआईआर में लगे हैं। इनमें से दो दहाई में कुछ लोगों की मौतें हुई है तो यह दुखद भले हो, अलार्मिंग नहीं है। लेकिन इस अमानवीय तर्क से शायद ही कोई सहमत हो। यदि काम के दबाव में एक भी सरकारी कर्मचारी की मौत हुई है तो वह चिंताजनक और गंभीर बात है। दूसरे, यह मौतें लगभग उन सभी राज्यों में हो रही हैं, जहां एसआईआर हो रहा है।सवाल उठ रहा लेकिन मौत का कारण स्पस्ट है चलिए मैं आपको बताती हूं…

BLO की मौत का कारण स्पस्ट है..ना हेल्थ-किट,ना एम्बुलेंस,ना प्राथमिक इलाज,गर्मी में लू,सर्दी में स्ट्रोक,बारिश में फिसलकर चोट और सिस्टम की भाषा क्या है..सुनिए,,,मृत्यु आकस्मिक थी।यानी इंसान खत्म…फाइल क्लोज़।”अब सबसे दर्दनाक सच्चाई जब BLO मरते हैं,सिस्टम चुप रहता है।लेकिन जब किसी घर का फॉर्म गलत अपलोड हो जाए… किसी मतदाता की उम्र में गलती हो जाए…या कोई कलेक्टर नाराज हो जाए…तुरंत BLO पर FIR हो जाती है!हाल ही में कई राज्यों में मामले सामने आए..आधार में गलती हुआ तो BLO पर FIR, Duplicate voter entry हुई तो BLO पर FIR, Booth verification में देरी हुई तो BLO पर FIR..गलती कोई भी करे,उंगली BLO पर।

अब ज़रा आप सोचिए…एक BLO पूरे दिन गाँव में घूमता है,लोगों के घर दरवाजे खटखटाता है,गालियाँ सुनता है,धूप, बारिश सहता है,रात 11 बजे तक रिपोर्ट बनाता है,और गलती? 0.01% भी हो गई,तो FIR?क्या यही न्याय है?क्या यह वही लोकतंत्र है जिसकी हम बात करते हैं?”“हम सब यह पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं‘एक BLO की मौत’ लेकिन किसी परिवार के लिएवह मौत नहीं,पूरी जिंदगी का ढह जाना होता है।

सिस्टम के लिए BLO सिर्फ संख्या है लेकिन परिवार के लिए BLO उनकी पुरी दुनिया। “अगर सरकारें चाहें तो ये मौतें रुक सकती हैं उसे बड़ा बजट भी नहीं चाहिए। 8 घंटे से ज्यादा काम ना कराया जाए।BLO के लिए कम से कम 20–25 लाख बीमा की पौलिशी लाई जाये।BLO पर सीधे FIR नहीं पहले विभागीय जांच होनी चाहिए..फिर जिम्मेदार अधिकारी को भी जवाबदेह बनाना होगा।सर्वर, समय-सीमा, तकनीकी ट्रेनिंग। BLO को रोबोट नहीं, इंसान समझा जाए।आज सिर्फ एक सवाल कब तक BLO अपनी जान देकर इस सिस्टम को चलाते रहेंगे?कब तक एक रिपोर्ट, एक फॉर्म, एक सर्वेकिसी इंसान की जिंदगी से बड़ा रहेगा?और अगर सरकारें, अधिकारी, समाज आज भी नहीं जागा…तो इतिहास यही लिखेगा की भारत ने अपने सबसे ईमानदार कर्मचारियों को काम के बोझ से मार दिया।हमारा सिर्फ इतना कहना है,BLO मशीन नहीं हैं।इंसान हैं।और उनकी जिंदगी भी उतनी ही कीमती है…जितना उनका काम।

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एयर नाऊ स्पेशल

देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा...

न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति....
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