Saturday, August 8, 2026

यूपीआई पेमेंट विवाद पर वित्त मंत्री के दावों को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बताया ‘भ्रामक’

नई दिल्ली: यूपीआई भुगतान पर शुल्क यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान पर पलटवार किया है. उन्होंने वित्त मंत्री के तर्कों को “पांच संदिग्ध दावों” पर आधारित बताते हुए कहा कि सरकार ज़ीरो-एमडीआर की वैधानिक सुरक्षा को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है.

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दरअसल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि एमडीआर केवल व्यापारियों पर लागू होता है, ग्राहकों पर नहीं. उन्होंने यह भी कहा था कि यूपीआई एवं सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को अभी एमडीआर पर फैसला लेना है और इस विषय पर संसद में रचनात्मक चर्चा हो सकती थी.

वित्त मंत्री का दावा भ्रामक

जयराम रमेश ने कहा कि वित्त मंत्री का यह दावा भ्रामक है कि एमडीआर सिर्फ व्यापारियों पर लागू होगा, ग्राहकों पर नहीं. उनका तर्क है कि व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में जोड़कर अंततः उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं. उन्होंने कहा कि इसका असर छोटे व्यापारियों, किराना दुकानों और रेहड़ी-पटरी वालों पर भी पड़ेगा, जो यूपीआई के सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में शामिल हैं.

कांग्रेस ने उठाया सवाल

कांग्रेस नेता ने सरकार के इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि एमडीआर से बैंकों और फिनटेक कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सुरक्षा में निवेश करने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि यूपीआई एक सार्वजनिक डिजिटल व्यवस्था है और इसकी सुरक्षा व संचालन की ज़िम्मेदारी सरकार की है. उनके मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बिना व्यापारियों या ग्राहकों पर शुल्क डाले भी इस व्यवस्था को समर्थन देने में सक्षम है.

एमडीआर पर अंतिम फैसला अभी होना बाकी

जयराम रमेश ने कहा कि सरकार का यह कहना कि एमडीआर पर अंतिम फैसला अभी होना बाकी है, पर्याप्त नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10ए के तहत ज़ीरो-एमडीआर की वैधानिक गारंटी को समाप्त कर देता है और भविष्य में शुल्क लगाने का अधिकार सरकार के नोटिफिकेशन पर छोड़ देता है.

उन्होंने संशोधन के समय पर भी सवाल उठाए. संसद में इस मुद्दे पर चर्चा न होने के सवाल पर जयराम रमेश ने सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने विपक्ष की मांगों पर चर्चा से परहेज किया और जवाबदेही से बचते हुए विधेयक को लोकसभा में ध्वनिमत से पारित करा लिया.

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