BY- Rohit Anil Tripathi
कौन हैं Subhash Chandra Garg? जो कभी कहते हैं कि देश की जीडीपी के आंकड़े सही नहीं हैं, कभी अपनी किताब में तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक बैठक का अंदरूनी किस्सा बताते हैं, कभी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को अपनी आईएएस की नौकरी छोड़ने की वजह बताते हैं और अब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे पर ब्लैकमेलिंग जैसे गंभीर आरोप लगाने की वजह से चर्चा में हैं।
Highlights:
एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े आंकड़े पर सवाल, दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों के पुराने किस्से और तीसरी तरफ एक सांसद के साथ सीधी भिड़ंत। तो आखिर ये सज्जन हैं कौन और इनके पास ऐसी कौन-कौन सी कहानियां हैं, जो जब बाहर आती हैं तो सियासी और आर्थिक हलकों में हलचल मच जाती है?
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बात शुरू होती है उस जीडीपी से, जिसकी वजह से पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इन दिनों सुर्खियों में हैं. 31 अगस्त को भारत की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून की जीडीपी के आंकड़े आए। आंकड़ा था 7.8 फीसदी। मतलब सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.8 फीसदी की दर से बढ़त दर्ज की। ये आंकड़ा इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि उस वक्त दुनिया और भारत दोनों कई आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहे थे। ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संकट अलग चिंता पैदा कर रहा था. उम्मीदों के बीच 7.8 फीसदी की वृद्धि सामने आई तो इसे बेहतर प्रदर्शन के तौर पर देखा गया।
लेकिन फिर Subhash Chandra Garg सामने आए और बोले, कहानी इतनी सीधी नहीं है। एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने जीडीपी के इस आंकड़े पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि 7.8 फीसदी का आंकड़ा अर्थव्यवस्था की असली रफ्तार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। गर्ग के मुताबिक इस अवधि में नाममात्र जीडीपी वृद्धि करीब 2.6 फीसदी होनी चाहिए थी और वास्तविक वृद्धि शून्य के करीब।
उनके इन दावों के बाद बहस शुरू हुई। विपक्षी नेताओं और कुछ अर्थशास्त्रियों ने भी उनके तर्क को उठाया। बहस ऐसी बढ़ी कि फिर सांख्यिकी और आंकड़े तैयार करने वाली सरकारी संस्था को सामने आ कर सफाई देनी पड़ी। मंत्रालय ने छह बिंदुओं में इन सवालों का जवाब दिया और कहा कि जीडीपी की गणना की प्रक्रिया और जारी किए गए 7.8 फीसदी के आंकड़े सही हैं।
अब जरा पीछे चलते हैं, क्योंकि Subhash Chandra Garg कोई बाहर से आए अर्थशास्त्री नहीं हैं। वो उस सरकारी व्यवस्था के भीतर रह चुके हैं, जिसके आंकड़ों और नीतियों पर आज सवाल उठा रहे हैं। गर्ग 1983 बैच के राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। 2014 में केंद्र सरकार में आए और वर्ल्ड बैंक में कार्यकारी निदेशक बनाए गए। विश्व बैंक दुनिया की बड़ी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में से एक है, जो अलग-अलग देशों के विकास और आर्थिक मामलों में काम करता है।
वहां करीब तीन साल रहने के बाद जून 2017 में गर्ग को आर्थिक मामलों के विभाग का सचिव बनाया गया। ये वित्त मंत्रालय का बेहद जरूरी विभाग है। देश की इकोनॉमिक पॉलिसी, फ़ॉरेन फाइनेंस और कई बड़े फाइनेंसीयल मामलों में इसकी भूमिका होती है। फिर मार्च 2019 में गर्ग को देश का फाइनेंस सेक्रेटरी बना दिया गया। यानी वित्त मंत्रालय के छह सेक्रेटरीज में सबसे सीनियर सेक्रेटरी। उस वक्त वित्त मंत्रालय की नौकरशाही में सबसे ऊपर बैठे अधिकारी गर्ग थे।
लेकिन कहानी यहां से 360 डिग्री घूमती है। जुलाई 2019 में Subhash Chandra Garg का तबादला वित्त मंत्रालय से ऊर्जा मंत्रालय कर दिया गया। और इसके ठीक एक दिन बाद उन्होंने आईएएस से वॉलंटरी रिटायरमेंट के लिए अप्लाई कर दिया। बिना इस्तीफा दिए चलते तो अक्टूबर 2020 में रिटायर हो जाते। यानी अभी एक साल से ज्यादा का वक्त बाकी था, लेकिन गर्ग ने सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया।
बाद में उन्होंने खुद बताया कि सरकार की फिनेन्सियल पॉलिसीज और खास तौर पर तत्कालीन फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के साथ उनके बड़े मतभेद थे. अब निर्मला सीतारमण की बात. वह 2019 में वित्त मंत्री बनीं और भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री हैं।
Subhash Chandra Garg की किताब में मतभेदों का जिक्र
गर्ग ने बाद में अपने ब्लॉग और किताब में उनके साथ अपने मतभेदों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जरूरी पॉलिसी के मामलों पर उनके गंभीर मतभेद थे और वित्त मंत्री के साथ उनका संबंध ऐसा नहीं रह गया था जिसमें वह ठीक तरीके से काम कर सकें। 2023 में आई अपनी किताब वी ऑल्सो मेक पॉलिसी में तो गर्ग ने सीतारमण को लेकर एक बेहद सीधी बात लिखी।
उन्होंने अपनी वॉलंटरी रिटायरमेंट के बारे में कहा कि , Nirmala Sitharaman is the principal reason for making this book happen. यानी गर्ग ने अपनी किताब के बनने की वजहों में सीतारमण को प्रमुख कारण बताया और लिखा कि मंत्रालय में उनके साथ सीतारमण से होने वाली परेशानियों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं कि उन्हें अक्टूबर 2019 में आईएएस से स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेना पड़ा।
लेकिन गर्ग और सरकार के बीच कहानी सिर्फ वित्त मंत्री तक सीमित नहीं थी। उनके कार्यकाल का सबसे बड़ा विवाद आरबीआई यानी भारतीय रिजर्व बैंक के साथ टकराव को लेकर रहा। आरबीआई देश का सेंट्रल बैंक है। रुपये, बैंकिंग व्यवस्था और मॉनीटरी पॉलिसी से जुड़े बड़े मामलों में उसकी अहम भूमिका होती है।
2018 में वित्त मंत्रालय और आरबीआई के बीच एक बड़ा सवाल उठा कि केंद्रीय बैंक के पास कितना रिजर्व रहना चाहिए और उसमें से कितना पैसा सरकार के साथ साझा किया जा सकता है। Subhash Chandra Garg के नेतृत्व में आर्थिक मामलों के विभाग ने आरबीआई की आर्थिक पूंजी व्यवस्था की समीक्षा शुरू की। वित्त मंत्रालय के आकलन के मुताबिक आरबीआई के पास करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी थी, जिसे केंद्र सरकार के साथ शेयर किया जा सकता था।लेकिन आरबीआई ये सुनते ही परेशान हो गया। उस समय आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य थे।
विरल आचार्य अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे और 2017 से 2019 तक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रहे। उन्होंने अक्टूबर 2018 में सरकार को केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता और उसके रिजर्व को लेकर चेतावनी दी। उनका तर्क था कि अगर सरकार केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती तो आगे चलकर वित्तीय बाजारों की प्रतिक्रिया झेलनी पड़ सकती है। गर्ग ने इसका जवाब भी सार्वजनिक तौर पर दिया।
उन्होंने रुपये, कच्चे तेल, शेयर बाजार और बॉन्ड बाजार के आंकड़ों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि अगर बाजार सरकार से नाराज है तो फिर बाजार की स्थिति ऐसी क्यों दिखाई दे रही है।और अब आता है वो किस्सा, जिसकी वजह से गर्ग की किताब का एक हिस्सा खूब चर्चा में आया था।
14 सितंबर 2018 को अर्थव्यवस्था की हालत की समीक्षा के लिए एक बैठक हुई थी। उस समय सरकार और आरबीआई के बीच पहले से तनाव था। Subhash Chandra Garg ने अपनी 2023 में आई किताब वी ऑल्सो मेक पॉलिसी में लिखा कि उस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल पर नाराज हो गए थे और उनकी तुलना snake who sits over a hoard of money से की थी।
यानी गर्ग के मुताबिक प्रधानमंत्री ने उर्जित पटेल की तुलना ऐसे सांप से की, जो पैसों के भंडार पर बैठा हो। उर्जित पटेल उस समय आरबीआई के गवर्नर थे।
उर्जित पटेल 2016 में इस पद पर आए थे और 10 दिसंबर 2018 में उन्होंने गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया था। अगले ही दिन रिजर्व बैंक के नए गवर्नर के तौर पर शक्तिकान्त दास की तैनाती हुई. इसी बैठक के बारे में Subhash Chandra Garg ने एक और दिलचस्प बात लिखी।
मुताबिक उर्जित पटेल ने उस समय अर्थव्यवस्था की हालत पर अपनी चिंता जाहिर की थी। आरबीआई और सरकार के बीच तनाव सिर्फ रिजर्व के पैसे को लेकर नहीं था। सरकारी बैंकों पर लगाई गई पाबंदियां, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए नकदी की व्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े कई दूसरे मुद्दे भी सामने थे।
सरकार और आरबीआई के बीच तनाव इतना बढ़ा कि वित्त मंत्रालय ने आरबीआई कानून की धारा 7 का इस्तेमाल किया। आजादी के बाद यह प्रावधान पहली बार इस्तेमाल किया गया था। बाद में उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर बने।
शक्तिकांत दास पहले सरकार में वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी और आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके थे। Subhash Chandra Garg के कार्यकाल में एक और बड़ा प्रस्ताव आया था। 2019-20 के बजट में सरकार ने विदेशी बाजारों से विदेशी मुद्रा में सरकारी बॉन्ड जारी करने की बात कही। आसान भाषा में समझिए तो सरकार विदेश से विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने का रास्ता खोलना चाहती थी। लेकिन इस प्रस्ताव का सरकार के भीतर ही विरोध हुआ और आखिरकार इसे आगे नहीं बढ़ाया गया.
इसके बाद गर्ग ने सरकारी सेवा छोड़ दी। लेकिन चुप नहीं बैठे। 2023 में उनकी पहली किताब आई और 2025 में दूसरी किताब नो, मिनिस्टर। इन किताबों में उन्होंने सरकार के अंदर नीति कैसे बनती है, अफसरों और मंत्रियों के बीच रिश्ते कैसे चलते हैं और कई बड़े आर्थिक फैसलों के पीछे क्या बातचीत होती है, उसका अपना अनुभव लिखा।
उन्होंने तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन का भी जिक्र किया। मुख्य आर्थिक सलाहकार यानी सरकार को आर्थिक मामलों पर सलाह देने वाला मुख्य आर्थिक विशेषज्ञ।
Subhash Chandra Garg ने लिखा कि 2017 के इकोनॉमिक सर्वे को लेकर भी अंदरूनी मतभेद थे। उनका दावा था कि उन्होंने अरविंद सुब्रमणियन को फिनेंशियल जिम्मेदारी से जुड़े असहमति वाले नोट को हटाने और जीडीपी के अनुमान को ज्यादा सकारात्मक बनाने के लिए मनाया। उन्होंने यह भी लिखा कि अरविंद सुब्रमणियन इस पूरी स्थिति से परेशान थे और एक समय उन्होंने सरकार छोड़ने की बात तक कही थी।
और अब आते हैं निशिकांत दुबे पर। निशिकांत दुबे झारखंड के गोड्डा से भाजपा सांसद हैं और कई बार लोकसभा के लिए चुने जा चुके हैं। गर्ग और दुबे की कहानी भी नई नहीं है। 2018 में दुबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की आर्थिक नीतियों और काम करने के तरीके पर सवाल उठाए थे। वह पुराना पत्र अब जीडीपी विवाद के बीच फिर चर्चा में आया।
अब 2026 में दोनों के बीच फिर ठन गई। एक पॉडकास्ट में गर्ग ने दावा किया कि निशिकांत दुबे उनके पास वित्त मंत्रालय में एक काम लेकर आए थे। गर्ग के मुताबिक मामला भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी के चेयरमैन के जरिए कोई काम करवाने से जुड़ा था।
गर्ग का कहना था कि उन्होंने यह काम करने से मना कर दिया क्योंकि एलआईसी उनके विभाग के अंतर्गत नहीं आती थी और वह इस तरह के काम नहीं करते थे। इसके बाद Subhash Chandra Garg ने दुबे को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए और कहा कि निशिकांत दुबे ब्लैकमेलिंग किस्म के आदमी हैं। यह गर्ग का आरोप है, जिसे दुबे ने खारिज किया है।
निशिकांत दुबे ने इसके जवाब में गर्ग पर पलटवार किया और उनके आरोपों को मानहानि बताया। उन्होंने Subhash Chandra Garg को कानूनी नोटिस भेजकर बिना शर्त माफी मांगने और आरोप वापस लेने की मांग की। दुबे ने चेतावनी दी कि ऐसा नहीं होने पर आपराधिक मानहानि की कार्रवाई की जाएगी।


