राँची: झारखंड के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान, राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (रिम्स) में मेडिकल नामांकन और करोड़ों रुपये के टेंडर आबंटन में हुई कथित धांधली को लेकर सीआईडी का शिकंजा पूरी तरह कस गया है। बुधवार को सीआईडी की दो विशेष टीमों ने रिम्स परिसर में एक साथ धावा बोलकर इस बड़े घपले की कड़ियों को जोड़ना शुरू कर दिया है। सीआईडी की इस अचानक हुई एंट्री से रिम्स प्रबंधन और प्रशासनिक अमले के भीतर हड़कंप मच गया है।
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ADG के आदेश पर CID का एक्शन
मिली जानकारी के अनुसार, सीआईडी के अपर पुलिस महानिदेशक के कड़े निर्देश पर दो अलग-अलग टीमों का गठन किया गया है। बुधवार सुबह ही इन टीमों ने रिम्स के डीन कार्यालय और डेटा सेंटर पर अपनी पोजीशन ले ली है। इस जांच के मुख्य बिंदु रिम्स प्रबंधन पर लगे आरोपों पर केंद्रित हैं। आरोप है कि वर्ष 2025 के मेडिकल पाठ्यक्रमों के नामांकन के दौरान भारी अनियमितता बरती गई। अयोग्य अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के लिए कथित तौर पर फर्जी जाति और निवास प्रमाणपत्रों का सहारा लिया गया। वहीं जांच को फुलप्रूफ बनाने के लिए सीआईडी अपने साथ तकनीकी और मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों को भी लेकर आई है। ये विशेषज्ञ कंप्यूटर डेटा, डिजिटल लॉग्स और ऑफलाइन फाइलों का बारीकी से मिलान कर रहे हैं। टीमों ने कई घंटों की छानबीन के बाद मिले तमाम संदिग्ध दस्तावेजों, डिजिटल बैकअप और महत्वपूर्ण फाइलों को अपने कब्जे में ले लिया है। इसके साथ ही वहां तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों से भी गहन पूछताछ की जा रही है।

सिर्फ एडमिशन ही नहीं, टेंडर घोटाले की भी उठी परतें
रिम्स में चल रहा यह खेल सिर्फ छात्रों के भविष्य और सीटों की हेराफेरी तक ही सीमित नहीं है। सीआईडी को रिम्स के कई बड़े टेंडर आबंटन प्रक्रियाओं में भी भारी वित्तीय गड़बड़ियों की शिकायतें मिली हैं। सूत्रों के मुताबिक, पूर्व में भी रिम्स में मेडिकल उपकरणों और अन्य सुविधाओं की खरीद में धांधली की बातें सामने आ चुकी हैं, लेकिन इस बार सीआईडी सीधे उन फाइलों को खंगाल रही है जहां से नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को टेंडर बांटे गए।
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योग्य अभ्यर्थियों के विरोध के बाद जागा था प्रशासन
यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब पिछले वर्ष (2025) मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में शामिल हुए कई योग्य अभ्यर्थियों ने इस धांधली के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई थी। अभ्यर्थियों का आरोप था कि दिन-रात मेहनत करने वाले छात्रों की जगह पैसे और रसूख के बल पर अयोग्य लोगों को सीटें बेच दी गईं। छात्रों के लगातार विरोध और मानवाधिकार स्तर पर शिकायतों के बाद मामले की प्रारंभिक जांच कराई गई थी। प्रारंभिक पड़ताल में आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाए जाने के बाद मामले की कमान सीआईडी को सौंप दी गई। अब देखना यह होगा कि सीआईडी की इस जांच में रिम्स के कौन-से सफेदपोश अधिकारी और सॉल्वर गैंग के चेहरे बेनकाब होते हैं। झारखंड के मेडिकल विंग में यह पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई मानी जा रही है।
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