पटना : बिहार में निशांत कुमार के जदयू में शामिल होने के बीच दूसरे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में 16 मार्च को राज्यसभा का चुनाव भी होना है क्योंकि पांच सीटों के लिए 6 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. ऐसे में एक सीट पर मुकाबला तय माना जा रहा है और इसको लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति भी तेज हो गई है। महागठबंधन भी अपने एक उम्मीदवार की जीत के लिए रणनीति बनाने में जुटा है। परंतु महागठबंधन की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस इस मुद्दे फिलहाल मौन है। कांग्रेस की यह चुप्पी राजद के साथ राजनीति को जानने समझने वालों के लिए भी न समझ में आने वाली पहेली है।
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कांग्रेस खुलकर आने से कर रही संकोच
कांग्रेस महागठबंधन के उम्मीदवार को अपना समर्थन देगी अथवा नहीं इस मसले पर कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व अब तक इस खुलकर सामने नहीं आया है। प्रदेश अध्यक्ष से लेकर बिहार प्रभारी तक ने सार्वजनिक तौर पर कोई स्पष्ट टिप्पणी करने से परहेज किया है। यह स्थिति उस वक्त है जब विधानसभा के मौजूदा संख्या बल में कांग्रेस की स्थिति ऐसी नहीं है कि दावेदारी पेश कर सके। बावजूद वह न तो अब तक राजद के समर्थन में सामने आई है न ही विरोध में।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस की यह चुप्पी उसकी रणनीतिक विवशता का परिणाम है। एक ओर वह महागठबंधन की एकता तो बनाए रखना चाहती है, परंतु समर्थन में खुल कर सामने आने से बच रही है। इसकी वजह है कांग्रेस के अंदर एका का न होना। पार्टी का एक धड़ा राजद के साथ गठबंधन को लेकर पहले से असहज माना जाता रहा है, जबकि दूसरा धड़ा गठबंधन की राजनीति को मजबूरी और आवश्यकता दोनों मानता है।
कांग्रेस की चुप्पी का राज
इसी आंतरिक मतभेद के कारण कांग्रेस फिलहाल स्पष्ट रुख से बच रही है। फिलहाल कांग्रेस की रणनीति वेट एंड वाच की है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राज्यसभा चुनाव के इस समीकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन की राजनीति में संख्या बल ही सबसे बड़ा कारक होता है। बहरहाल कांग्रेस की चुप्पी के बीच यह चर्चा इस बात की है कि बिहार में मौजूदा स्थिति में राजद का पलड़ा तभी भारी माना जाएगा जबकि उसके अन्य सहयोगी उसके साथ पूरी ताकत से एक साथ खड़े नजर आएं।


