लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके दल से नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र से बने रिश्ते से होती है। बलिया की रसड़ा विधानसभा से लगातार तीन बार विधायक रहे बहुजन समाज पार्टी के नेता उमाशंकर सिंह ऐसे ही जनप्रतिनिधि थे। उनके निधन के साथ न केवल पूर्वांचल ने एक प्रभावशाली नेता खोया है, बल्कि विधानसभा में बसपा की मौजूदगी भी समाप्त हो गई है। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे और बुधवार को उनका निधन हो गया।
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उमाशंकर सिंह की राजनीतिक यात्रा आसान नहीं थी। बलिया के नगरा क्षेत्र के खनवर गांव से निकलकर उन्होंने अपने दम पर ऐसा जनाधार बनाया कि रसड़ा विधानसभा उनकी राजनीतिक कर्मभूमि बन गई। बसपा के संगठनात्मक ढांचे में उनका विशेष स्थान था और पार्टी सुप्रीमो मायावती के विश्वासपात्र नेताओं में उनकी गिनती होती थी। यही कारण था कि प्रदेश में बसपा के लगातार कमजोर होते जनाधार के बीच भी वह अपनी सीट बचाए रखने में सफल रहे।
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नेताओं ने दी विनम्र श्रद्धांजलि
उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता से सीधा संवाद था। क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर वे लगातार सक्रिय रहते थे। राजनीतिक विरोधियों के बीच भी उनकी व्यक्तिगत स्वीकार्यता थी। यही वजह थी कि रसड़ा में उनका चुनाव केवल दल का नहीं, बल्कि उनके व्यक्तिगत प्रभाव का चुनाव माना जाता था।
विधानसभा में बसपा के इकलौते विधायक होने के कारण पिछले कुछ वर्षों में उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई थी। सदन में जब भी बसपा की आवाज उठती थी, वह अकेले उमाशंकर सिंह के माध्यम से सुनाई देती थी। ऐसे दौर में, जब क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लगातार बदल रहा था, उन्होंने अपने क्षेत्र में संगठन और जनसंपर्क के सहारे राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखी।
उमाशंकर सिंह का राजनीतिक व्यक्तित्व केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं था। वह ऐसे नेता थे जिनके यहां आम लोगों की आवाज आसानी से पहुंचती थी। क्षेत्र में किसी भी सामाजिक या व्यक्तिगत संकट के समय उनकी मौजूदगी लोगों को भरोसा देती थी। यही कारण है कि उनके निधन की खबर फैलते ही बलिया ही नहीं, पूरे पूर्वांचल में शोक की लहर दौड़ गई। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी।
राजनीति में नेताओं का मूल्य केवल पद से नहीं, बल्कि जनता के बीच उनके विश्वास से तय होता है। उमाशंकर सिंह ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में यही विश्वास अर्जित किया। रसड़ा की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक एक ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में याद किया जाएगा, जिसने बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भी जनता से अपना रिश्ता नहीं टूटने दिया।


