रायपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा कि यदि अनुसूचित जनजाति का कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से हिंदू रीति-रिवाज़ को अपनाता है, तो उस पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू होगा. हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा है कि अगर कोई अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से हिंदू रीति-रिवाज़ और परंपराएं अपनाता है और उसी तरीक़े से शादी करता है, तो उसे हिंदू मैरिज एक्ट-1955 के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता.
जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीज़न बेंच ने बस्तर के फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक दंपति की आपसी सहमति से तलाक की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गई थी. मामला बस्तर से जुड़े एक दंपति का है, जिसमें पत्नी अनुसूचित जाति से थी और पति अनुसूचित जनजाति से. दोनों की शादी 15 अप्रैल, 2009 को हिंदू रीति-रिवाज़ों से हुई थी, जिसमें सात फेरे की रस्म भी निभाई गई थी. बाद में दोनों के बीच मतभेद हुए और वे 2014 से अलग रहने लगे.
इसके बाद दंपति ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक़ के लिए फ़ैमिली कोर्ट में आवेदन दिया. लेकिन फ़ैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए अर्ज़ी ख़ारिज कर दी कि पति अनुसूचित जनजाति से है, इसलिए हिंदू मैरिज एक्ट उस पर लागू नहीं होता. अब हाईकोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला वापस उसी अदालत को भेज दिया है.


