नई दिल्ली: दिल्ली में बीजेपी की रेखा गुप्ता सरकार को एक साल पूरे हो गए है। आज ही के दिन यानी 20 फरवरी 2026 को बीजेपी ने दिल्ली में 27 वर्षों बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई थी। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड भी पेश किया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अपनी सरकार को ‘बहानों की राजनीति’ से दूर ‘काम की संस्कृति’ वाली सरकार बता रही हैं। उनके अनुसार, सरकार ने ‘मैं‘ के बजाय ‘हम‘ के सिद्धांत पर चलते हुए पहली ही कैबिनेट में आयुष्मान योजना लागू की, जिससे अब तक हजारों लोग लाभान्वित हो चुके हैं। इसके अलावा, गरीबों के लिए ‘अटल कैंटीन’ और झुग्गी वासियों के लिए पक्के मकानों का बजट आवंटित करना उनकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है। बुनियादी ढांचे के स्तर पर 180 किलोमीटर नई सीवर लाइन बिछाने को सरकार अपनी बड़ी जीत मान रही है।
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विपक्षी ने साधा निशाना
विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (AAP) ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए सरकार पर चौतरफा हमला बोला है। पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सरकार की घेराबंदी करते हुए इसे धोखे का साल करार दिया। सिसोदिया का आरोप है कि भाजपा ने चुनाव से पहले महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये देने का जो वादा किया था, वह एक साल बाद भी फाइलों में ही दबा है। इसके अलावा, मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा का मुद्दा भी गरमाया हुआ है। आरोप है कि निजी स्कूलों ने मनमाने ढंग से फीस में दो से तीन गुना बढ़ोतरी की है, जिसे रोकने में सरकार विफल रही है। ‘जहाँ झुग्गी, वहीं मकान‘ के नारे को लेकर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा और आरोप लगाया कि गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें बेघर किया जा रहा है।
दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या प्रदूषण- सिसोदिया
दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या प्रदूषण को लेकर भी इस साल भारी विवाद रहा। जहाँ एक तरफ दिल्ली ने इतिहास का सबसे खराब AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) दर्ज किया, वहीं विपक्ष ने सरकार पर डेटा के साथ छेड़छाड़ करने और निगरानी केंद्रों के पास पानी का छिड़काव कर आंकड़ों को कृत्रिम रूप से सुधारने का गंभीर आरोप लगाया। यमुना की सफाई, जो भाजपा का एक प्रमुख चुनावी वादा था, वह भी अभी तक अधर में नजर आ रही है। बजट में इसके लिए आवंटित राशि को विशेषज्ञ नाकाफी बता रहे हैं और स्थिति यह है कि छठ पूजा जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों पर भी यमुना का पानी जहरीला बना रहा।
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रेखा गुप्ता का कैसा रहा राजनीतिक सफर
प्रशासनिक अनुभव की बात करें तो तीन बार की पार्षद रहीं रेखा गुप्ता की तुलना अक्सर शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज जैसे कद्दावर नेताओं से की जाती रही है। आलोचकों का मानना है कि उनका यह साल प्रशासनिक सुधारों से ज्यादा सार्वजनिक छवि बनाने (PR) और पब्लिसिटी में बीता। सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान उनकी कुछ जुबानी फिसलनों और तकनीकी गलतियों ने भी विरोधियों को चुटकी लेने का मौका दिया। फिलहाल, विपक्ष की संगठनात्मक कमजोरी और पुराने दिग्गजों की अन्य राज्यों में व्यस्तता के कारण रेखा गुप्ता सरकार को एक ‘सुरक्षित गलियारा’ मिला हुआ है। लेकिन एक साल बीतने के बाद अब जनता की उम्मीदों और चुनावी वादों का बोझ सरकार पर बढ़ता जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार केवल पीआर के भरोसे अपनी साख बचाए रखती है या वास्तव में दिल्ली की बुनियादी समस्याओं का स्थायी समाधान निकाल पाती है।


