राँची: न्याय प्रक्रिया धीमी हो सकती है, किंतु अंतिम निर्णय सत्य के पक्ष में ही होता है। यह कहावत झारखंड पुलिस के कांस्टेबल गोपाल राम के मामले में सटीक बैठती है। झारखंड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 26 साल से बर्खास्त गोपाल राम की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है और उन्हें तत्काल सेवा में बहाल करने का आदेश जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना पुख्ता सबूतों के किसी कर्मचारी को नौकरी से निकालना अत्यधिक कठोर कदम है।
Highlights:
क्या था मामला?
यह कानूनी लड़ाई साल 1997 से शुरू हुई थी। गोविंदपुर थाना में तैनात आर्म्ड गार्ड गोपाल राम पर आरोप लगा था कि उन्होंने शराब के नशे में अपने वरिष्ठ अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार और हंगामा किया। इसी आरोप के आधार पर विभागीय जांच हुई और 1 मार्च 2000 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। गोपाल राम के लिए यह सफर आसान नहीं था। उन्होंने 24 सालों तक हर स्तर पर संघर्ष किया:
- 1988: आर्म्ड गार्ड के रूप में नियुक्ति।
- 2000: सेवा से बर्खास्तगी का आदेश।
- 2001: विभागीय अपील खारिज हुई।
- 2002: पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) भी ठुकरा दी गई।
- 2024: हाई कोर्ट ने सभी पुराने आदेशों को रद्द कर दिया।
- 2026: हाई कोर्ट ने सारे आरोपों से मुक्त कर नियुक्ति का दिया आदेश।
कोर्ट के फैसले कि अहम बातें
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कांस्टेबल पर शराब पीने का आरोप तो लगाया गया, लेकिन इसे साबित करने के लिए कोई मेडिकल जांच नहीं कराई गई थी। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल मौखिक आरोपों के आधार पर किसी का करियर खत्म कर देना न्यायसंगत नहीं है। हाई कोर्ट ने फैसला सुनते हुए कहा कि बर्खास्तगी, अपील और पुनरीक्षण के सभी पुराने आदेशों को निरस्त कर दिया गया है। पिछले सालों के बकाया वेतन पर फैसला बाद में लिया जाएगा। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार चाहे तो नियमों के तहत सजा पर दोबारा विचार कर नया आदेश जारी कर सकती है, लेकिन वह कानून सम्मत होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया उदाहरण
न्यायमूर्ति ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मुन्ना लाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि सजा हमेशा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। बिना ठोस साक्ष्य और गवाहों से जिरह (Cross-examination) का मौका दिए बिना दी गई सजा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।


