रांची: राज्य के जेलों में बंद कैदियों की समयपूर्व रिहाई मामले में कोर्ट के स्वतः संज्ञान पर सुनवाई झारखंड हाई कोर्ट में हुई। मामले में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार को पूरक शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को पूरक शपथ पत्र में यह बताने का निर्देश दिया है कि राज्य के जेलों में बंद कितने कैदी रिहाई के लिए पात्र हुए, कितनों के मामलों पर विचार किया गया और उसका क्या परिणाम रहा।
इससे पूर्व राज्य सरकार द्वारा शपथ पत्र दाखिल किया गया। जिसमें बताया गया कि वर्ष 2019 में कुल 670 कैदी रिहा किए गए, जिनमें से 558 का भौतिक सत्यापन किया गया। इनमें 470 कैदियों को विभिन्न सरकारी योजनाओं जैसे वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन और आयुष्मान कार्ड का लाभ मिला, जबकि 41 रिहा कैदियों की मृत्यु हो चुकी है।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लेख किया जिसमें कहा गया है कि पात्र कैदियों के मामलों पर नियमित अंतराल पर समयपूर्व रिहाई के लिए विचार किया जाना अनिवार्य है। राज्य की नीति के अनुसार गठित राज्य सजा समीक्षा बोर्ड की बैठक हर तीन महीने में होनी चाहिए, लेकिन अदालत ने पाया कि इस संबंध में स्पष्ट अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई है। जिसपर राज्य सरकार ने पूरक शपथपत्र दाखिल करने का आग्रह किया।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने हाईकोर्ट कार्यालय की लापरवाही पर गंभीर आपत्ति जताई। झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) को पक्षकार बनाए जाने के बावजूद रिकॉर्ड में आवश्यक दस्तावेज शामिल नहीं किए गए थे। इस पर अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 7 जनवरी 2026 को होगी।


