गिरिडीह : झारखंड में माओवाद के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच गिरिडीह पुलिस को एक और बड़ी सफलता मिली है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) की एरिया कमेटी सदस्य अनिता किस्कू उर्फ बबीता ने मंगलवार को पुलिस अधीक्षक डॉ. बिमल कुमार के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। वह लंबे समय से पारसनाथ, लुगू पहाड़ी, झुमरा पहाड़ी और कोल्हान क्षेत्र में सक्रिय थी। गिरिडीह पुलिस ने बताया कि अनिता ने झारखंड सरकार की “नई दिशा–एक नई पहल” आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर बिना किसी दबाव के आत्मसमर्पण किया है।
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पुनर्वास नीति से प्रभावित

गिरिडीह पुलिस का कहना है कि सरकार की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ने और सामान्य जीवन अपनाने का निर्णय लिया है। पुलिस का मानना है कि उनके आत्मसमर्पण से क्षेत्र में सक्रिय अन्य नक्सलियों को भी हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की प्रेरणा मिलेगी।
अनिता किस्कू लंबे समय से माओवादी संगठन से जुड़ी हुई थीं और उनके खिलाफ विभिन्न थानों में हत्या, पुलिस पर हमला, रंगदारी, विस्फोटक अधिनियम, यूएपीए, आर्म्स एक्ट समेत कई गंभीर नक्सली मामले दर्ज हैं। वह संगठन की एरिया कमेटी सदस्य के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रही थीं।
2009 में संगठन में हुई थी शामिल

बोकारो जिले के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के दोहड़ी जलगा टोली निवासी अनिता किस्कू वर्ष 2009 में नारी मुक्ति संघ के माध्यम से माओवादी संगठन के संपर्क में आई थी। बाद में वह संतोष महतो, भवन महतो और पतीराम महतो जैसे नक्सली नेताओं के साथ सक्रिय रही।
वर्ष 2017 में उसने कुख्यात माओवादी अजय महतो उर्फ टाइगर से जंगल में संगठन की परंपरा के अनुसार विवाह किया। इसके बाद वह संगठन की गतिविधियों में लगातार शामिल रही और एरिया कमेटी सदस्य के पद तक पहुंच गई। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, संगठन के लिए हथियार और विस्फोटक छिपाने, लेवी वसूली, ग्रामीणों में दहशत फैलाने तथा पुलिस और सुरक्षा बलों के खिलाफ कई हिंसक घटनाओं में उसकी सक्रिय भूमिका रही। उसके खिलाफ झारखंड के विभिन्न थानों में कई गंभीर नक्सली मामले दर्ज हैं।
पूछताछ में अनिता ने बताया कि शुरुआती दिनों में संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर वह जुड़ी थी, लेकिन समय के साथ शीर्ष कमांडरों द्वारा निचले कैडरों के शोषण, ग्रामीणों के साथ मारपीट और निर्दोष लोगों पर अत्याचार से उसका मोहभंग हो गया। लगातार पुलिस कार्रवाई और हाल ही में पति अजय महतो की गिरफ्तारी के बाद उसने हथियार छोड़ने का निर्णय लिया।


