न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति. लेकिन सोचिए, अगर कुछ साल बाद कोई कहे कि झारखंड देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा है। यहां आईटी कंपनियां दफ्तर खोलना चाहती हैं। सरकारी फैसले डेटा देखकर लिए जाएंगे। गांव का आदमी व्हाट्सऐप पर सरकारी सेवा ले रहा होगा और रांची का नाम आईटी मैप पर बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे के साथ लिया जाएगा। सुनने में थोड़ा फिल्मी है, लेकिन फिलहाल कहानी कुछ ऐसी ही लिखने की कोशिश हो रही है.
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दिल्ली में नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन 2026
8 और 9 जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन 2026 होने वाला है। पहली नजर में लगेगा कि ये भी सरकार का एक और कॉन्फ्रेंस होगा। मंच लगेगा, भाषण होंगे, फोटो खिंचेंगे और बात खत्म। लेकिन झारखंड इस मंच पर सिर्फ भाषण देने नहीं जा रहा, वह अपना डिजिटल भविष्य पेश करने जा रहा है। देश-विदेश की करीब 100 बड़ी टेक कंपनियां, निवेशक, पॉलिसी एक्सपर्ट और टेक्नोलॉजी सेक्टर के बड़े खिलाड़ी वहां मौजूद होंगे। इन्हीं के सामने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बताएंगे कि आने वाले वर्षों में झारखंड किस रास्ते पर चलना चाहता है।
खनिज़ संपदा से अलग पहचान
पहली बार ऐसा लग रहा है कि राज्य अपनी पहचान बदलने की कोशिश कर रहा है। अब तक झारखंड की पहचान जमीन के नीचे दबे खनिजों से थी, अब सरकार जमीन के ऊपर मौजूद दिमागों पर दांव लगा रही है. क्योंकि दुनिया बदल चुकी है। पहले ताकत उस राज्य के पास होती थी जिसके पास ज्यादा खदानें होती थीं, आज ताकत उसके पास है जिसके पास ज्यादा डेटा है, टेक्नोलॉजी है, इनोवेशन है और ऐसी नीतियां हैं जो कंपनियों को लुभा सकें। यही वजह है कि दिल्ली का यह कार्यक्रम झारखंड के लिए ज़रूरी माना जा रहा है।
रांची आईटी पार्क
अब जरा उस प्रोजेक्ट की बात करते हैं जिस पर सबसे ज्यादा चर्चा है , रांची आईटी पार्क। सरकार पहली बार इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करने जा रही है। करीब 101 एकड़ में बनने वाला यह आईटी पार्क राजधानी रांची के कोर कैपिटल एरिया में विकसित होगा। एक तरफ आईआईएम रांची, दूसरी तरफ बिरसा मुंडा एयरपोर्ट। यानी पढ़ाई भी पास और उड़ान भी पास। अब आप पूछेंगे कि आखिर आईटी पार्क की जरूरत क्यों? इसका जवाब झारखंड के हजारों युवाओं के पास है।
हर साल यहां से 20 हजार से ज्यादा आईटी ग्रेजुएट निकलते हैं। डिग्री यहीं मिलती है लेकिन नौकरी के लिए बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, नोएडा और गुरुग्राम जाना पड़ता है। अगर बड़ी कंपनियां रांची आती हैं तो पहली बार बड़ी संख्या में युवाओं को अपने ही राज्य में करियर बनाने का मौका मिलेगा। पलायन कम होगा, रोजगार बढ़ेगा और शहर की अर्थव्यवस्था में नई रफ्तार आएगी। सरकार निवेशकों को सिर्फ सपना नहीं दिखा रही, ऑफर भी दे रही है।
आईटी पॉलिसी 2023 के तहत निवेश का 50 प्रतिशत तक सरकार खुद देगी, स्टाम्प ड्यूटी में पूरी छूट मिलेंगी और बिजली बिल में राहत जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। क्योंकि कंपनियां सिर्फ जमीन नहीं देखतीं वे सरकार का रवैया और भविष्य की संभावनाएं भी देखती हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पॉलिसी
अब आते हैं उस शब्द पर जिसने पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा चर्चा छेड़ी है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। झारखंड पहली बार अपनी एआई पॉलिसी लेकर आ रहा है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में स्टेट एआई मिशन बनाने का प्रस्ताव है और JAP-IT इसे लागू करने वाली नोडल एजेंसी होगी। साथ ही झारखंड एआई क्लाउड को भारत सरकार के IndiaAI प्लेटफॉर्म से जोड़ने की तैयारी है ताकि राज्य का डिजिटल ढांचा राष्ट्रीय एआई नेटवर्क के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। लेकिन असली बात यह है कि सरकार एआई को सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं मान रही, उसे प्रशासन का हिस्सा बनाना चाहती है।
मुख्यमंत्री डेटा इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म
अगर किसी जिले में किसानों तक योजना नहीं पहुंच रही तो डेटा वजह बता सकेगा। अगर किसी अस्पताल में दवाइयां खत्म होने वाली हों तो पहले से अलर्ट मिलेगा। अगर किसी विभाग की फाइलें अटक रही हों तो उसकी पहचान भी तेजी से हो सकेगी। यानी फैसले अनुमान से नहीं आंकड़ों के आधार पर लिए जाएंगे। इसी सोच के तहत मुख्यमंत्री डेटा इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म यानी सीएम डीआईपी का कॉन्सेप्ट भी सामने रखा जाएगा। आज हर विभाग के पास अपना-अपना डेटा है, लेकिन वे अक्सर एक-दूसरे से जुड़े नहीं होते। सीएम डीआईपी का मकसद इस दूरी को खत्म करना है ताकि सरकार के पास एक ही जगह पूरा डेटा मौजूद हो और फैसले तेज और ज्यादा असरदार बन सकें।
व्हाट्सऐप आधारित नागरिक सेवाएं
सरकार की कोशिश सिर्फ सचिवालय तक सीमित नहीं है बल्कि गांवों तक डिजिटल सेवाएं पहुंचाने के लिए व्हाट्सऐप आधारित नागरिक सेवाओं की भी तैयारी है ताकि लोग स्थानीय भाषा में घर बैठे सरकारी योजनाओं की जानकारी और दूसरी सेवाएं हासिल कर सकें। साथ ही इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर का कॉन्सेप्ट भी सामने आएगा जिससे अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल, रियल टाइम मॉनिटरिंग और तेज प्रशासनिक फैसले संभव हो सकें।
अब बात निवेश की। कोई भी बड़ी टेक कंपनी सिर्फ अच्छी सड़क देखकर निवेश नहीं करती। वह देखती है कि सरकार कितनी सहयोगी है, नीति कितनी स्पष्ट है, कितना टैलेंट मौजूद है और भविष्य कितना सुरक्षित दिखाई देता है। झारखंड इसी भरोसे को बनाने की कोशिश करेगा। अगर यह कोशिश सफल होती है तो इसका असर सिर्फ आईटी सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा। होटल, रियल एस्टेट, शिक्षा, स्टार्टअप, ट्रांसपोर्ट और सर्विस सेक्टर तक इसका फायदा पहुंच सकता है। क्योंकि आईटी इंडस्ट्री कभी अकेले नहीं आती, वह अपने साथ पूरा आर्थिक इकोसिस्टम लेकर चलती है। यही वजह है कि इस आयोजन को सिर्फ सरकारी कार्यक्रम नहीं माना जा रहा।
झारखंड की नई ब्रांडिंग
यह झारखंड की नई ब्रांडिंग की शुरुआत हो सकती है। एक ऐसा झारखंड जिसकी पहचान सिर्फ खदानों से नहीं बल्कि डेटा सेंटर से भी हो, जो सिर्फ कोयले से नहीं बल्कि कोडिंग से भी जाना जाए और जिसकी पहचान सिर्फ मिनरल्स नहीं बल्कि मशीन लर्निंग भी बने। बेशक किसी भी योजना की असली परीक्षा जमीन पर होती है।
आईटी पार्क कब बनता है, कितनी कंपनियां आती हैं, एआई पॉलिसी कितनी तेजी से लागू होती है और डिजिटल गवर्नेंस लोगों तक कितनी पहुंचती है, इन सवालों के जवाब आने वाले साल देंगे। लेकिन इतना तय है कि 8 और 9 जुलाई की ये दो तारीखें झारखंड के लिए सिर्फ कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं। ये उस नई कहानी की शुरुआत हो सकती हैं जिसमें खनिजों की राजधानी कहलाने वाला झारखंड, डिजिटल इंडिया के नक्शे पर भी अपनी मजबूत पहचान दर्ज कराने की तैयारी कर रहा है.




