रांची: राजधानी रांची के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान रिम्स की करीब 7 एकड़ अधिग्रहित सरकारी जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेचने के महाघोटाले में कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। मामले की मुख्य आरोपियों में से एक लवली देवी की अग्रिम जमानत याचिका पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ( ACB ) की विशेष अदालत में अहम सुनवाई हुई।
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पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने एसीबी को इस मामले से जुड़ी केस डायरी पेश करने का कड़ा आदेश दिया था। हालांकि, इस बार भी एसीबी की ओर से कोर्ट में केस डायरी प्रस्तुत नहीं की जा सकी। इस पर अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई 2026 की तिथि मुकर्रर की है और एसीबी को हर हाल में केस डायरी पेश करने का दोबारा निर्देश दिया है।
1964-65 में अधिग्रहित जमीन को निजी बताकर बिल्डरों को बेचा
रिम्स जमीन घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, भू-माफियाओं का एक बेहद शातिर नेटवर्क बेनकाब हो रहा है। जांच में इस बात का खुलासा हुआ है कि भू-माफियाओं ने साल 1964-65 में रिम्स के लिए अधिग्रहित की गई सरकारी जमीन को जाली कागजातों के दम पर अपनी ‘निजी संपत्ति’ घोषित कर दिया था। इसके बाद करोड़ों रुपये की इस कीमती जमीन को बड़े-बड़े बिल्डरों के हवाले कर दिया गया।
झारखंड हाई कोर्ट के बेहद सख्त और कड़े रुख के बाद इस पूरे मामले की जांच का जिम्मा एसीबी को सौंपा गया था। हाई कोर्ट के डंडे के बाद हरकत में आई एसीबी ने इसी साल अप्रैल महीने में इस केस से जुड़े 4 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इनमें फर्जी वंशावली तैयार करने वाले कार्तिक बड़ाईक और राज किशोर बड़ाईक के अलावा चेतन कुमार और दलाल राजेश कुमार झा शामिल हैं।
16 सरकारी अफसर और कर्मचारी रडार पर
करोड़ों के इस जमीन घोटाले की आंच सिर्फ जमीन दलालों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी महकमे के भीतर भी खलबली मची हुई है। बिना अंचल कार्यालय और निबंधन कार्यालय के अधिकारियों की मिलीभगत के इतनी बड़ी सरकारी जमीन का म्यूटेशन और हेरफेर मुमकिन नहीं था।
यही वजह है कि इस मामले में 16 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी सीधे तौर पर एसीबी के रडार पर हैं, जिनसे कभी भी पूछताछ हो सकती है और बड़ी कार्रवाई की गाज गिर सकती है।
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अब पूरी कमान 10 जुलाई की सुनवाई पर टिकी है। यदि एसीबी कोर्ट में मजबूत केस डायरी पेश करती है, तो आरोपी लवली देवी की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
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