नई दिल्ली : भारत के 23 विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर भारत की चुनाव प्रक्रिया पर चिंता जताई है. लाइव लॉ के मुताबिक, “दलो ने ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ (एसआईआर) प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और दावा किया है कि हाल के चुनावों के नतीजे ‘जनता की इच्छा’ को नहीं दर्शाते हैं.”
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“बीजेपी का विरोध करने वाली एक जैसी सोच वाली पार्टियों’ की तरफ से लिखे गए इस लेटर में आरोप लगाया गया है कि ईडी, सीबीआई और एनआईए जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को ‘टारगेट’ करने और चुनी हुई सरकारों को गिराने के लिए किया जाता है.” इसमें यह भी कहा गया है कि जहां भी उचित हो, वहां पेपर बैलेट वोटिंग सिस्टम को वापस लाने पर विचार किया जाए.
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पत्र में कहा गया
पार्टियों की ओर से लिखे गए पत्र में कहा गया है, “मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कथित तौर पर हर राज्य में वोटर लिस्ट को ठीक करने का फ़ैसला किया. इसका मकसद यह पक्का करना था कि लिस्ट में सिर्फ़ उन्हीं लोगों के नाम हों जो संविधान और ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ के तहत वोट देने के हकदार हैं.”
पत्र में आगे कहा गया है. “मुख्य चुनाव आयुक्त के मुताबिक, वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न प्रोसेस ज़रूरी था. लेकिन नतीजा बिल्कुल उल्टा निकला. एसआईआर का यह प्रयोग सबसे पहले बिहार में शुरू किया गया था. इस प्रोसेस को सही ठहराने के लिए राजनीतिक बयानबाज़ी मुख्य रूप से बिहार की वोटर लिस्ट में बांग्लादेशियों के कथित घुसपैठ पर केंद्रित थी.
“अब जब बिहार विधानसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं, तो ऐसा कोई डेटा नहीं है जिससे पता चले कि वाकई ऐसी कोई घुसपैठ हुई थी और न ही चुनाव आयोग ने भारत में गैर-कानूनी तरीके से वोट देने का अधिकार पाने वाले बांग्लादेशियों की संख्या के बारे में कोई डेटा सार्वजनिक किया है.”




