न्यूज डेस्क : सावन का महीना शुरु हो चुका है. लोग श्रद्धा भक्ति के साथ कांवड़ यात्रा पर जाना शुरु भी कर चुके हैं. लेकिन हमेशा की तरह कावड़ यात्रा के दौरान डीजे बजाते हुए लोग निकल रहे थे. लेकिन ये खुशी अचानक मताम में बदल गया. दरअसल, ये सांप्रदायिक हिंसा भारत में नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल में घटी है. मामला इतना बढ़ा कि बात हाथापाई तक आ गई और देखते ही देखते ही ये हाथापाई संप्रादायिक हिंसा में तब्दील हो गई हैं. और इस हिंसा की आग पिछले चार दिन से लगी हुई है. हालात ऐसे बन गये हैं कि सरकार को कर्फ्यू तक लगाना पड़ गया.
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कैसे शुरु हुई हिंसा?
सबसे पहले हम ये जान लेते हैं ये हिंसा शुरू हुई कहां से हुई. द वायर की रिपोर्ट् के मुताबिक, हिंसा की शुरुआत 26 जुलाई की शाम को भारतीय सीमा से 20 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित देवांगनज में हुई. हजारों हिंदू श्रद्धालु कोशी बांध से लौट रहे थे, जहां वे कांवड़ यात्रा के लिए पवित्र जल एकत्र किया था. भगवा झंडे लिए और डीजे बजाते हुए लोग की कांवड़ यात्रा कप्तानगंज चौक की ओर बढ़ रहा था, तभी स्थानीय मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने डीजे बजाने को लेकर आपत्ति जताई. स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, उस दिन पहले ही इलाके में तनाव बढ़ गया था जब कथित तौर पर एक मुस्लिम झंडा हटाकर उसकी जगह हिंदू झंडा लगा दिया गया था.
मामूली बहस पत्थरबाजी में तब्दील
एक मामूली बहस से शुरू हुआ मामला जल्द ही दोनों समूहों के बीच पत्थरबाजी में तब्दील हो गया, जिससे और भी भीड़ जमा हो गई. झड़पें तेज होने पर पुलिस ने पहले भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की, फिर गोलीबारी शुरू कर दी. एक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई और पुलिसकर्मियों समेत करीब दो दर्जन लोग घायल हो गए. प्रशासन ने अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगा दिया और व्यवस्था बहाल करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया.
हालांकि, कर्फ्यू लागू होने के बाद भी हिंसा समाप्त नहीं हुई.रात भर में, देवांगंज के कुछ हिस्सों में घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की खबरें सामने आईं, जबकि झड़पों की अफवाहें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गए. अगले दिन तक, मधेस के अन्य इलाकों में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, और फिर ये मामला एक व्यापक सांप्रदायिक आंदोलन में तब्दील हो गया.
30 जुलाई को सिराहा में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की गोलीबारी में 15 वर्षीय एक लड़के की मौत के साथ फिर से तनाव पैदा हो गया. उसकी मौत से पुलिस कार्रवाई में मरने वालों की संख्या तीन हो गई और नए सिरे से प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने आसपास के इलाकों में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ की.
हिंसा के बाद कर्फ्यू लागू
इन चार दिनों में, दक्षिणी मैदानी इलाकों में पश्चिम की ओर बढ़ते तनाव के चलते अधिकारियों ने कई कस्बों में कर्फ्यू और निषेधाज्ञा लागू कर दी, जिनमें भारत के साथ नेपाल का प्रमुख व्यापारिक प्रवेश द्वार बीरगंज भी शामिल है. सिराहा, महोत्तरी, मोरंग और अन्य जिलों में सुरक्षा बढ़ा दी गई.
इधर नेपाली सेना ने नेपाल पुलिस और पुलिसिया बल के साथ मिलकर पेट्रोलिंग शुरू कर दी ताकि फिर से कोई नया प्रर्दशन शुरु न हो सके. कुछ कस्बों में ड्रोन निगरानी भी शुरू कर दी गई. क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती के बावजूद, प्रदर्शनकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहे थे और कई इलाको में आवाजाही पूरी तरह से ठप हो गई थी.
10 लाख का मुआवजा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मृतकों के परिवारों ने शुरू में शवों को लेने से इनकार कर दिया और जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ सरकारी मुआवजे की मांग की. अधिकारियों के साथ बातचीत के बाद ही एक समझौता हुआ, जिसके बाद सरकार ने मृतकों को शहीद घोषित करने, प्रत्येक शोक संतप्त परिवार को 10 लाख नेपाली रुपये का मुआवजा देने और परिवार के एक पात्र सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया.
नेपाल पर पड़ा असर
हालांकि शुक्रवार तक बड़े पैमाने पर झड़पें शांत हो गई थीं, लेकिन कई जिलों में सुरक्षा कर्फ्यू जारी है. वहीं एक्सपर्ट का मानना है कि लगातार चार दिनों से जारी इस हिंसा ने नेपाल के सामाजिक सौहार्द आर्थिक गतिविधियों और आंतरिक सुरक्षा पर गहरा असर डाला है. अगर ये हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए तो इसका बॉर्डर वाले इलाकों के व्यापार, यहां तक की भारत और नेपाल के बीच सामान्य आवाजाही पर भी असर पड़ सकता है. हालांकि नेपाल में बिगड़ते हालातों के बीच भारत और नेपाल के बॉडर पर सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. और अब भी नेपाल में सुरक्षा बल संवेदनशील इलाकों में निगरानी बनाए हुए हैं.


