नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम गाने से जुड़े गृह मंत्रालय के सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश अनिवार्य नहीं है और इसमें किसी दंड का प्रावधान भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे। उन्हेंने कहा कि यह याचिका समय से पहले दायर की गई है। कोर्ट के मुताबिक, याचिका केवल संभावित भेदभाव की आशंका पर आधारित है।
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निर्देश अनिवार्य नहीं: कोर्ट
बेंच ने साफ किया कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी केवल एक प्रोटोकॉल है, जिसे मानना अनिवार्य नहीं है। साथ ही इसमें वंदे मातरम न गाने पर किसी प्रकार की सजा का प्रावधान भी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में इस सर्कुलर के आधार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है या इसे अनिवार्य बनाया जाता है, तब इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा
यह याचिका मुहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर की गई थी। उनके वकील संजय हेगड़े ने दलील दी कि वंदे मातरम गाने के दौरान व्यवधान करने पर सजा का प्रावधान हो सकता है और लोगों पर इसे गाने का दबाव बनाया जा सकता है। दरअसल गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम बजाने की बात कही गई थी। इसमें कार्यक्रम के दौरान लोगों को खड़े रहने की सलाह दी गई है।
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जन गण मन से पहले गाया जाएगा वंदे मातरम
सर्कुलर के अनुसार, यदि वंदे मातरम और जन गण मन दोनों गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम प्रस्तुत किया जाएगा। इस दौरान सभी लोगों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। नए दिशा-निर्देशों में वंदे मातरम के सभी 6 अंतरे गाने की बात कही गई है, जिसकी कुल अवधि करीब 3 मिनट 10 सेकंड है। पहले आमतौर पर इसके सिर्फ शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मामला ठंडा पड़ता दिख रहा है, लेकिन यदि भविष्य में इस सर्कुलर को लेकर कोई विवाद या कार्रवाई होती है, तो यह मुद्दा फिर अदालत में उठ सकता है।


