नई दिल्ली : दिल्ली के पूर्व सीएम व आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से जुड़े कथित शराब घोटाला मामले की सुनवाई से न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने खुद को अलग करने की मांग को खारिज कर दिया है। यह मांग पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल ने ही सुनवाई के दौरान की थी.
Highlights:
याचिका खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने अपनी टिप्पणी में कहा, “अगर मैं खुद को इस मामले से अलग कर लेती हूं तो जनता को यह लगने लगेगा कि जज किसी खास राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। यह अदालत, खुद को मामले से अलग करके, ऐसी धारणा बनने की अनुमति नहीं दे सकती।”
इसे भी पढ़ें: दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र में निर्माणाधीन फैक्ट्री में हादसा, लेंटर गिरने से कई श्रमिक घायल
जज के लिए काम करना नामुमकिन
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मेरा न्यायिक करियर 34 साल का है। लेकिन, क्या ऐसा हो सकता है कि जजों को अब मुकदमा लड़ने वाले की तरफ से तय किया गया एक और टेस्ट पास करना पड़े, ताकि यह साबित हो सके कि वे केस सुनने के लिए योग्य हैं? ऐसे में, जजों को उस मनगढ़ंत टेस्ट की शर्तों को पूरा करना होगा, जैसे कि उन्होंने किसी संगठन के कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया हो, या उनके परिवार के सदस्य कानूनी पेशे में न हों। ऐसा होने पर किसी भी जज के लिए काम कर पाना नामुमकिन हो जाएगा।
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मुझे पता है कि एक न्यायाधीश के रूप में मेरी आलोचना की जाएगी। चाहे वो इंटरनेट मीडिया हो या आवेदक। मुझे पता है कि मुझे कितना और क्या करना है। उन्होंने कहा कि अगर मैं बिना सुने इन्कार कर देती तो मैं अपनी ड्यूटी सरेंडर कर देता।
गहरे संवैधानिक प्रभाव होंगे
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यह बार-बार कहा गया था कि मेरी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है और मेरी बहुत इज्जत करते हैं पर उन्होंने कहा कि वो अपने मन का क्या करें जब उनके मन में ऐसे विचार आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुनवाई से अलग होने के गहरे संवैधानिक प्रभाव होंगे।
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मैंने अपने आप से पूछा कि अगर मैं इनकार नहीं करूंगी तो क्या हो सकता है। फिर मैंने सोचा अगर मैं मना कर दूं तब क्या होगा। उन्होंने कहा कि मैंने बहुत से एमपी-एमएलए केस भी दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर किए हैं, अगर मुझे महसूस हुआ कि केस यहां नहीं सुना जाना चाहिए।


