Thursday, July 23, 2026

हिमंता सरकार संकट में! मटक समेत 6 समुदायों का अल्टीमेटम

देश : असम इन दिनों दो बड़े कारणों से सुर्खियों में है। पहला, राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग का निधन, जिसने पूरे असम को शोक में डाल दिया। दूसरा, और कहीं ज्यादा राजनीतिक मायनों में अहम, मटक समेत छह आदिवासी समुदायों का बड़ा आंदोलन। यह आंदोलन अब सरकार के गले की हड्डी बन चुका है। पिछले दस दिनों से असम की सड़कों पर जिस तरह से भीड़ उमड़ रही है, उसने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा को तनाव में डाल दिया है।

आंदोलन क्यों शुरू हुआ?

मटक समुदाय और उनके साथ पांच और जनजातियां चाय जनजाति, ताई अहोम, मोरान, चुटिया और कोच राजबोंगशी सालों से अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहे हैं। इनका कहना है कि वे मूल रूप से आदिवासी हैं, लेकिन सरकार ने अब तक उन्हें आधिकारिक मान्यता नहीं दी। यही वजह है कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक फैसलों में इनकी आवाज दबा दी जाती है। अब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और इन समुदायों ने सड़क पर उतरकर सरकार को अल्टीमेटम दे दिया है। 19 सितंबर को तिनसुकिया से इसकी शुरुआत हुई। वहां करीब 50 हजार लोग हाथ में मशाल लेकर रैली में शामिल हुए। फिर 26 सितंबर को डिब्रूगढ़ में 30 हजार से ज्यादा लोग उतरे। रैली इतनी बड़ी थी कि राजधानी गुवाहाटी तक उसकी गूंज सुनाई दी। भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे युवा, जिनमें ज्यादातर की उम्र 30 साल से भी कम थी। मटक स्टूडेंट यूनियन के केंद्रीय अध्यक्ष संजय हजारिका ने साफ कह दिया कि हर सरकार ने धोखा दिया है, अब आंदोलन तब तक चलेगा जब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आता।

छह समुदायों की सालों पुरानी मांग

मटक का मूड बदल चुका है। पहले ये बातचीत की टेबल पर आते थे, अब सीधे इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने 25 सितंबर को मटक नेताओं को बैठक के लिए बुलाया था, लेकिन समुदाय ने शामिल होने से मना कर दिया। यह सरकार के लिए सबसे बड़ा झटका है। क्योंकि पिछले ही महीने डिब्रूगढ़ में मोरान समुदाय ने भी एसटी दर्जे की मांग को लेकर विशाल रैली की थी। उनका नारा था—“नो एसटी, नो रेस्ट।” यूनियन के महासचिव जोयकांता मोरान ने कहा कि 2014 से लगातार सरकार के साथ बैठकें हो रही हैं, लेकिन नतीजा शून्य है। इस बार गुस्सा इतना ज्यादा है कि सब कुछ लिखित में लिया जा रहा है। सीएम से वार्ता में 25 नवंबर तक का समय मिला है। अगर तब तक कोई हल नहीं निकला तो पूरे राज्य में आर्थिक नाकेबंदी की चेतावनी दे दी गई है।

अब यहां सवाल उठता है कि ये मांग इतनी संवेदनशील क्यों है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की कुल आबादी 3.12 करोड़ थी, जिसमें 38 लाख यानी करीब 12.4 प्रतिशत आदिवासी हैं। अगर इन छह जनजातियों को एसटी दर्जा मिल जाता है तो यह आंकड़ा सीधा बढ़कर 40 प्रतिशत हो जाएगा। यानी असम के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे। गैर-आदिवासी समाज में भी यही डर है कि अगर एसटी आबादी 50 प्रतिशत से ऊपर चली गई तो असम का हाल नागालैंड और बाकी पूर्वोत्तर राज्यों जैसा हो जाएगा। छठी अनुसूची लागू करना केंद्र की मजबूरी बन जाएगा और फिर हर बड़े फैसले के लिए केंद्र सरकार को इन समुदायों की अनुमति लेनी पड़ेगी।

ST दर्जा मिलने से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने वादा किया था कि इन छह समुदायों को एसटी दर्जा मिलेगा। लेकिन एक दशक बीतने के बाद भी फाइलें मंत्रालयों के चक्कर ही काट रही हैं। यही वजह है कि अब ये आंदोलन सीधे चुनावी माहौल से जुड़ गया है। युवा पहली बार इतने बड़े पैमाने पर लामबंद हुए हैं और सरकार पर दबाव बना रहे हैं। पत्रकार राजीव दत्त, जो पिछले दो दशक से असम की राजनीति कवर कर रहे हैं, कहते हैं कि यह पहली बार है जब मटक और अन्य समुदाय इतने आक्रामक दिख रहे हैं। अबकी बार सिर्फ गुस्सा नहीं है, बल्कि एक संगठित रणनीति भी है। हर जिले में रैली, दिल्ली में जाकर विरोध और अगर जरूरत पड़ी तो आर्थिक नाकेबंदी।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा एक तरफ लगातार अपील कर रहे हैं कि बातचीत ही समाधान है, लेकिन सच्चाई यह है कि बातचीत का दरवाजा बंद हो चुका है। विपक्ष इस मौके को भुनाने की फिराक में है और बीजेपी को अपने ही वादे के कारण मुश्किल झेलनी पड़ रही है।

नतीजा साफ है कि असम की राजनीति अगले कुछ महीनों तक इन्हीं छह समुदायों की मांग के इर्द-गिर्द घूमेगी। और अगर समाधान नहीं निकला, तो विधानसभा चुनाव में इसका असर सीधे-सीधे दिखेगा। जुबीन गर्ग के गानों की तरह इस आंदोलन की आवाज भी हर गली-मोहल्ले में गूंज रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह सुर सरकार के कानों को चुभ रहे हैं।

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एयर नाऊ स्पेशल

देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा...

न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति....
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