एयरनाउ डेस्क : गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई पर हमला करने कि कोशिश वाले वकील की मेंबरशिप को तत्काल के लिए खत्म कर दिया गया है। वकील का नाम राकेश किशोर है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने कहा कि किसी भी वकील का इस तरह का व्यवहार बिल्कुल भी उचित नहीं है। ऐसी कोई भी हरकत शिष्टाचार और सुप्रीम कोर्ट की गरिमा का गंभीर उल्लंघन है। इसके साथ ही बेंगलुरु में भी ऑल इंडिया एडवोकेट एसोसिएशन ने राकेश किशोर के खिलाफ cji पर हमला करने के आरोप में FIR दर्ज करवाई है। बेंगलुरु पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की आर्टिकल 132 और 133 के तहत FIR दर्ज कर ली है। हालांकि CJI गवई, वकील के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने से इनकार कर चुके हैं.
दरअसल 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के अंदर वकील ने भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई पर हमला करने की कोशिश की थी। यह घटना उस समय हुई, जब चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच एक मामले की सुनवाई कर रही थी। वकील उनके डेस्क के पास गया और अपना जूता निकालकर उन पर फेंकने की कोशिश की। कोर्ट में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उसे तुरंत पकड़ लिया। बाहर निकलते समय वकील ने नारा लगाया, “हम सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।” इसके बाद चीफ जस्टिस ने कोर्ट में मौजूद वकीलों से कहा कि वे अपनी दलीलें जारी रखें और इस घटना से परेशान न हों। उन्होंने कहा, “मैं भी परेशान नहीं हूँ। मुझे ऐसी चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें अपना काम जारी रखना चाहिए। उनकी इस प्रतिक्रिया से कोर्ट की कार्यवाही बिना किसी बड़े व्यवधान के आगे बढ़ी। हालांकि कोर्ट कि कार्यवाही खत्म होने के बाद जूता फेंकने वाले वकील को पुलिस ने हिरासत में लेने के बाद सुप्रीम कोर्ट कैंपस में उस वकील से 3 घंटे पूछताछ की थी। पुलिस ने कहा था कि SC अधिकारियों ने मामले में कोई शिकायत नहीं की और फिर उनसे बातचीत के बाद वकील को छोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने उसी दिन आरोपी वकील का लाइसेंस रद्द कर दिया था। उसका रजिस्ट्रेशन 2011 का था। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने भी आरोपी को तुरंत निलंबित कर दिया था।
वकील राकेश किशोर 2011 से सुप्रीम कोर्ट बार में रजिस्टर्ड है। माना जा रहा है कि वह चीफ जस्टिस की मध्य प्रदेश के खजुराहो में भगवान विष्णु की सात फुट ऊंची खंडित मूर्ति की बहाली से जुड़ी टिप्पणियों से नाराज था। 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने खजुराहो के जवारी (वामन) मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की बहाली की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। चीफ जस्टिस ने कहा था, “जाओ और भगवान से खुद करने को कहो। तुम कहते हो कि तुम भगवान विष्णु के भक्त हो, तो उनसे प्रार्थना करो।” याचिकाकर्ता ने इस फैसले पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि यह फैसला उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि मूर्ति अपनी मौजूदा स्थिति में रहेगी और भक्त चाहें तो दूसरे मंदिर में पूजा कर सकते हैं। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह मूर्ति मुगल आक्रमणों के दौरान खंडित हुई थी और तब से उसी हालत में है। उन्होंने मांग की थी कि श्रद्धालुओं के पूजा करने के अधिकार और मंदिर की पवित्रता को बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करे। चीफ जस्टिस ने बाद में अपनी टिप्पणी पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि वह सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। बेंच में शामिल जस्टिस के विनोद चंद्रन ने सोशल मीडिया को “एंटी-सोशल मीडिया” कहा और बताया कि उनकी बातों को भी गलत तरीके से दिखाया गया। याचिकाकर्ता के वकील संजय नूली ने कहा कि चीफ जस्टिस के बारे में सोशल मीडिया पर फैलाए गए बयान गलत हैं।


