देश : आज छठ महापर्व का दूसरा दिन ‘खरना’ के रूप में मनाया जा रहा है। यह दिन विशेष रूप से व्रती महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस दिन वे पूरे दिन का उपवास रखकर सूर्यास्त के बाद प्रसाद ग्रहण करती हैं। इस दिन का आयोजन संतान सुख, परिवार की समृद्धि और छठी मैया की कृपा पाने के लिए किया जाता है।
Highlights:
खरना पूजा का महत्व
खरना पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है। इस दिन व्रति महिलाएं पूरे दिन का निर्जला उपवास रखती हैं और सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर, रोटी, रसियाव और फल का प्रसाद बनाकर छठी मैया को अर्पित करती हैं। इसके बाद वे स्वयं प्रसाद ग्रहण करती हैं और परिवार के अन्य सदस्यों में भी प्रसाद का वितरण करती हैं। यह दिन व्रति के लिए मानसिक और शारीरिक शुद्धता का प्रतीक होता है।
पूजा विधि और सामग्री
खरना पूजा की शुरुआत घर की सफाई और पवित्रता से होती है। व्रति महिलाएं नए और स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर जाती हैं। पूजा में मुख्य रूप से गुड़ की खीर, रोटी, रसियाव, फल (केला, नारियल, सिंघाड़ा, गन्ना, नींबू) और दीपक का उपयोग होता है। खीर बनाने में विशेष ध्यान दिया जाता है कि गुड़ को ठंडा होने के बाद डाला जाए, ताकि वह फटे नहीं। इसके लिए या तो गुड़ को पानी में घोलकर छानकर डाला जाता है, या कद्दूकस करके ठंडी खीर में मिलाया जाता है।
व्रतियों का उत्साह और श्रद्धा
खरना पूजा के दिन व्रति महिलाओं में विशेष उत्साह और श्रद्धा देखने को मिलती है। वे न केवल धार्मिक अनुष्ठान करती हैं, बल्कि अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतान सुख की कामना भी करती हैं। इस दिन का आयोजन पूरे परिवार के साथ मिलकर किया जाता है, जिससे पारिवारिक संबंधों में भी मजबूती आती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
छठ पूजा का वैज्ञानिक आधार भी है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक मात्रा में एकत्रित होती हैं। इन किरणों के संभावित दुष्प्रभावों से मानव जाति और जीव-जगत की रक्षा के लिए यह पूजा की परंपरा प्रभावी मानी जाती है। इस पर्व के दौरान सूर्य नारायण की आराधना से दीर्घायु, तेजस्वी संतान की प्राप्ति, सुख-समृद्धि एवं असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। यह पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ आध्यात्मिक लाभ भी निहित हैं।
समापन
खरना पूजा के साथ ही छठ महापर्व की आधिकारिक शुरुआत होती है। इसके बाद व्रति महिलाएं 36 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं, जिसमें वे संतान सुख, परिवार की समृद्धि और छठी मैया की कृपा की कामना करती हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी संदेश देता है।
इस दिन की विशेषता यह है कि यह परिवार और समाज के बीच एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है। व्रति महिलाएं इस दिन अपने परिवार के साथ मिलकर पूजा करती हैं और एक-दूसरे के साथ प्रसाद का वितरण करती हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं।
इस प्रकार, छठ महापर्व का दूसरा दिन ‘खरना’ न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्व रखता है। यह दिन व्रति महिलाओं की श्रद्धा, समर्पण और परिवार के प्रति उनके प्रेम का प्रतीक है। इस दिन की पूजा विधि, सामग्री और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझकर हम इस पर्व के महत्व को और भी गहराई से समझ सकते हैं। आइए, हम सभी इस पर्व को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाएं और समाज में एकता और भाईचारे का संदेश फैलाएं।


