झारखंड : 6 अक्टूबर को NBTU में आयोजित दीक्षांत समारोह पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च किए जाने की खबर सामने आई है। यह खर्च इस तरह से किया गया कि लोगों को यह पूछने का अवसर मिला कि क्या यह राशि वाजिब और पारदर्शी तरीके से खर्च हुई है। यह खर्च सामान्य समारोह की अपेक्षा कहीं अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में यह विवाद का केंद्र बन गया है कि क्या यह राशि अनावश्यक या मनमाने तरीके से खर्च की गई है।
वित्तीय अधिकारी का त्यागपत्र और विवाद
इस पूरे विवाद के बीच, NBTU में दो वित्तीय सलाहकारों (Financial Advisors) ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। बताया जा रहा है कि उन्होंने इस खर्च और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर असहमति जताई थी। त्यागपत्रों की वजहें स्पष्ट नहीं की गई हैं, लेकिन माना जा रहा है कि यह फैसलों और प्रक्रियाओं के बीच मतभेदों से जुड़ी हो सकती हैं।
तकनीकी खरीद में नियमों की अवहेलना
कुलपति दिनेश सिंह पर यह भी आरोप है कि उन्होंने जेम पोर्टल पर कंप्यूटर खरीद के लिए विज्ञापन जारी किया, जबकि आवश्यक वित्तीय स्वीकृति नहीं ली गई थी। नियमों के अनुसार, सामग्री की खरीद से पहले वित्त विभाग की स्वीकृति लेनी अनिवार्य होती है। लेकिन इस मामले में कहा जाता है कि बिना स्वीकृति के प्रक्रिया शुरू की गई।
इसके अलावा, सरकारी नियमों का उल्लंघन करते हुए टेंडर प्रक्रिया का पालन न करने का आरोप भी लगाया गया है। इससे विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
Also Read : HC का सख़्त आदेश, निगम हटाए गरीबों के फ्लैट से कब्ज़ा
पूर्व विवादों का अतीत
दिनेश कुमार सिंह पहले भी विवादों में रह चुके हैं- वे रांची विश्वविद्यालय में प्रभारी कुलपति के रूप में काम कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक कॉलेज के प्राचार्य को दबाव डालने का आरोप झेला कि वह किसी व्यक्ति को फर्नीचर सप्लाई का ऑर्डर दें। इस शिकायत पर राज्यपाल ने उन्हें प्रभारी कुलपति के पद से हटा दिया था। विनोबा भावे विश्वविद्यालय में भी उनके समय पर गेस्ट हाउस के नवीनीकरण (Renovation) के नाम पर लगभग दो करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई गई थी। उस प्रस्ताव को विवादों में घिरने पर रद्द कर दिया गया था। ये पुरानी घटनाएं बताते हैं कि अपने प्रशासनिक कार्यों में लोगों ने उन्हें पारदर्शिता और नियमों के अनुपालन की कमी के आरोपों के घेरे में देखा है।
प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियां
- इन आरोपों के सामने आने के बाद अब कई तरह की चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं:
- विश्वविद्यालय को यह स्पष्ट करना होगा कि ये खर्च कैसे किए गए, बजट कहां से आए और स्वीकृति कैसी मिली।
- वित्तीय सलाहकारों के त्यागपत्र की जांच हो सकती है कि क्या उन्हें दबाव या अन्य प्रकार की बाधाएँ मिली थीं।
- नियमों के उल्लंघन में लगे अधिकारियों और निर्णायक मंडल के सदस्यों के खिलाफ जांच या आवश्यक कार्रवाई हो सकती है।
- यदि विश्वविद्यालय पारदर्शिता सिद्ध नहीं कर पाया, तो छात्रों, शिक्षकों और जनता के बीच विश्वास संकट हो सकता है।
राज्य सरकार और विश्वविद्यालय की प्रतिक्रिया अपेक्षित
वर्तमान में, इस मामले पर राज्य सरकार या विश्वविद्यालय की ओर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया प्रकाश में नहीं आई है।
विश्वविद्यालय को चाहिए कि वे एक सार्वजनिक बयान जारी करें जिसमें खर्चों का हिसाब और स्वीकृति प्रक्रिया स्पष्ट हो।
यदि आवश्यक हो, राज्य शिक्षा विभाग या उच्च शिक्षा आयोग इस मामले की जांच कर सकता है।
कुलपति दिनेश कुमार सिंह का नाम एक बार फिर विवादों में आया है। इस बार दीक्षांत समारोह पर संक्रमणीय खर्च, वित्तीय नियमों का उल्लंघन, और प्राकृतिक पारदर्शिता की कमी को लेकर। उनकी पिछली विवादों की पृष्ठभूमि को देखते हुए, सार्वजनिक और शैक्षिक जगत में यह मामला अधिक गहरा और महत्वपूर्ण हो जाता है। अब यह देखना होगा कि विश्वविद्यालय और सरकार इस घटना का जवाब कैसे देती हैं। क्या सही प्रक्रिया अपनाई जाएगी, जिम्मेदारों को दायित्व तय किया जाएगा, और छात्रों व शिक्षण समुदाय का विश्वास पुनर्स्थापित होगा।


