डेस्क: सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि श्री राधाष्टमी मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार, इस तिथि को राधा रानी का प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। श्री राधा रानी वृषभानु की पुत्री है जो बरसाना के राजा थे। और वो अपने पिता द्वारा किए एक यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भक्त राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं और राधा रानी का प्रकट उत्सव मानते है। मान्यता है कि राधा अष्टमी के दिन सच्ची श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने से भक्तों को उनके जीवन में सच्चे प्रेम, खुशहाली और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि यानी निशीथ काल में हुआ था, जबकि राधा रानी का प्राकट्य भ्रम मुहूरत में हुआ था। इसी वजह से राधा अष्टमी के दिन भ्रम मुहुर्त में राधा रानी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस साल राधाष्टमी शनिवार, 19 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।
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पूजा की सरल विधि
राधाष्टमी के दिन सुबह प्रता काल उठकर स्नान करने के बाद श्री राधा रानी का पूजन करना बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन आप सुबह सबसे पहले अपने पूजा घर को साफ कर ले। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और व्रत व पूजन का संकल्प लें। उसके बाद एक चौकी पर उनकी प्रतिमा या मूर्ति रखकर पूजा प्रारंभ करें। अगर आपके पास उनकी मूर्ति है तो आप उन्हें दूध, दही, शहद, शक्कर, घी और गंगा जल से सन्न करवाए।
इसके बाद उन्हें इसीलिए उन्हे नीले रंग के वस्त्र पहनाए क्योंकि उन्हें नीला रंग बेहद पसंद है, इसके बाद उन्हें 16 श्रृंगार की वस्तुएं और फूल अर्पित करें। फिर भोग लगाए माना जाता है कि राधा रानी को अरबी की सब्जी, राबरी, खीर, पान, मालपूआ बेहद पसंद है इसिलए हमे उन्हें इन चीजों का भोग लगाना चाहिए। आप चाहे तो फल और मिठाई का भोग लगा सकते है और उनके भोग में तुलसी का पत्ता जरूर दालें। क्योंकि बिना तुलसी पत्र के वे भोग स्वीकार नहीं करती है।
अंत में कपूर जला कर राधा रानी की आरती करें और प्रसाद बांटे। बता दें कि, इस दिन राधा कटाक्ष, हरे कृष्ण महा मंत्र और भजन का जाप करना काफी शुभ और फलदायक होता है। आप चाहे तो ‘ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः’ मंत्र का भी जाप कर सकते है।

