रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड सशस्त्र पुलिस यानी JAP के कांस्टेबल भरत पाठक की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर उनकी पुनर्बहाली का आदेश दिया है, जिसे एक शादीशुदा महिला के साथ कथित तौर पर अवैध संबंध रखने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने कहा कि एडल्ट्री अब कोई आपराधिक कृत्य नहीं है.
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हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग ने कांस्टेबल को उस आरोप के आधार पर नौकरी से निकाला जो चार्जशीट का हिस्सा ही नहीं था और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है. इस संबंध में बर्खास्त कांस्टेबल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. साल 2007 में वह कांस्टेबल के रूप में पुलिस बल में बहाल हुआ था.
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साल 2023 का मामला
दरअसल साल 2023 में एक महिला ने जैप कांस्टेबल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि शादीशुदा व बच्चे होने के बावजूद कांस्टेबल ने उससे कथित तौर पर शादी की और अक्टूबर 2019 से अप्रैल 2023 के बीच कई बार शारीरिक संबंध बनाए. बाद में कांस्टेबल ने महिला को साथ रखने से इनकार कर दिया. इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने और कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय जांच हुई तो पुलिस विभाग ने पुलिस मैनुअल के नियम 824(बी) के तहत कांस्टेबल को सेवा से बर्खास्त कर दिया था.
कोई पुख्ता सबूत नहीं
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि सेवा से बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह अवैध और मनमाना है. विभागीय चार्जशीट में आरोप सिर्फ एक शादीशुदा महिला के साथ संबंध रखने और अनुशासनहीनता का था. लेकिन जब बर्खास्तगी का अंतिम आदेश जारी हुआ तो उसका आधार बलात्कार की एफआईआर को बनाया गया जो चार्जशीट में शामिल ही नहीं था. जबकि सर्विस लॉ के तहत किसी कर्मचारी को केवल उन्हीं आरोपों पर सजा दी जा सकती है जो चार्जशीट में दर्ज हों.
बर्खास्तगी अधिकारों का दुरुपयोग
कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता महिला के बयानों के अलावा कोई सबूत नहीं था. न तो कथित शादी का कोई प्रमाण था न ही किसी होटल की सीसीटीवी फुटेज या किराये के मकान में साथ रहने का कोई सबूत पेश किया गया था. पुलिस विभाग के अनुशासनात्मक और अपीलीय प्राधिकारियों ने बिना सोचे-समझे और बिना ठोस सबूतों के कांस्टेबल को सेवा से हटाने जैसी गंभीर सजा दे दी जो कि उनके अधिकारों का दुरुपयोग है.




