न्यूज डेस्क: नेपाल में नई सख्ती के साथ लागू किए गए कस्टम ड्यूटी नियमों ने भारत-नेपाल सीमा पर व्यापार और आम लोगों की आवाजाही को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस फैसले के बाद दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ती नजर आ रही हैं। नेपाल में लागू नियम के तहत अब भारत से खरीदे गए 100 नेपाली रुपये (करीब 63 भारतीय रुपये) से अधिक के सामान पर 5% से लेकर 80% तक कस्टम ड्यूटी देनी पड़ रही है। यह नियम पहले से मौजूद था, लेकिन अब इसे सख्ती से लागू किया जा रहा है।
Highlights:
बालेन शाह के नेतृत्व में सख्ती
नेपाल में बालेन शाह के नेतृत्व में प्रशासन ने इस नियम को कड़ाई से लागू करना शुरू किया है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य राजस्व चोरी रोकना और अवैध आयात पर नियंत्रण करना है। इस फैसले का सीधा असर धारचूला, दार्जिलिंग, टनकपुर, सोनौली, रुपईडीहा, जोगबनी और रक्सौल जैसे सीमावर्ती इलाकों में देखने को मिल रहा है। जहां पहले नेपाली ग्राहकों की भीड़ रहती थी, अब वहां आवाजाही में कमी आ गई है। इससे भारतीय व्यापारियों, मजदूरों और ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोगों को आर्थिक नुकसान हो रहा है।
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नेपाली नागरिकों में नाराजगी
नेपाल के आम लोगों के लिए यह नियम परेशानी का कारण बन गया है। दशकों से लोग भारत से सस्ता और जरूरी सामान खरीदते रहे हैं, लेकिन अब भारी टैक्स के कारण उनकी खरीदारी सीमित हो गई है। कई लोग अब केवल जरूरी सामान ही खरीद रहे हैं या बिना खरीदारी के ही लौट जा रहे हैं। नेपाल की विपक्षी पार्टियों ने इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। नेपाली कांग्रेस ने इसे जन-विरोधी और असंवेदनशील करार देते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की है। कुछ नेताओं ने इसे अघोषित नाकाबंदी जैसा कदम भी बताया है।
जमीनी सीमा पर सख्ती, हवाई यात्रा में छूट
लोगों का आरोप है कि हवाई यात्रा के दौरान इन नियमों में छूट दी जाती है, जबकि जमीनी सीमा पर सख्ती बरती जा रही है। बॉर्डर पर सुरक्षा बल लगातार लाउडस्पीकर के जरिए घोषणा कर रहे हैं कि किसी को भी नियमों में छूट नहीं मिलेगी। नेपाल सरकार का कहना है कि इस सख्ती का मकसद राजस्व बढ़ाना और अवैध व्यापार पर लगाम लगाना है। हालांकि, इसका असर आम लोगों और सीमावर्ती व्यापार पर साफ तौर पर देखने को मिल रहा है। सीमा क्षेत्रों में जहां पहले नेपाली ग्राहक महीने भर का सामान एक साथ खरीदते थे, अब वे खरीदारी को छोटे हिस्सों में बांट रहे हैं। इससे बाजार की रौनक कम हो गई है और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।


