उत्तर प्रदेश : भारत में हर साल टोल प्लाजा पर सैकड़ों विवाद और मारपीट की घटनाएं सामने आती हैं? फास्टैग बैलेंस, ओवरचार्जिंग, लेन को लेकर बहस और निजी सुरक्षा कर्मियों की कथित दबंगई, ये सब अब आम होता जा रहा है। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली-गुरुग्राम के खेरकी दाला टोल प्लाजा पर ही बीते दो वर्षों में 200 से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। इसी कड़ी में अब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी का नाम जुड़ गया है, जहां एक टोल विवाद ने देखते ही देखते कानून-व्यवस्था का बड़ा संकट खड़ा कर दिया।
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घटना की शुरुआत
यह मामला प्रयागराज हाईकोर्ट के अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला लखनऊ की ओर जा रहे थे। रास्ते में बारा टोल प्लाजा पर उनका फास्टैग बैलेंस समाप्त होने को लेकर टोल कर्मियों से विवाद हो गया। आमतौर पर ऐसे मामलों में नकद भुगतान या तकनीकी समाधान के बाद विवाद खत्म हो जाता है, लेकिन यहां मामला बढ़ता चला गया। आरोप है कि टोल पर तैनात कर्मचारियों और निजी बाउंसरों ने मिलकर अधिवक्ता के साथ मारपीट की और उन्हें बेरहमी से पीटा। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही वकीलों के बीच भारी आक्रोश फैल गया। घटना के बाद हैदरगढ़ तहसील बार एसोसिएशन समेत आसपास के क्षेत्रों के वकील एकजुट हो गए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग शुरू हो गई।
सड़क पर उतरा आंदोलन
गुरुवार को सैकड़ों की संख्या में वकील बारा टोल प्लाजा पहुंचे। नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन तेज होता गया। वकीलों का उग्र रूप देखकर टोल कर्मी मौके से भाग निकले। गुस्से में आए प्रदर्शनकारियों ने टोल के सभी बूम बैरियर तोड़ डाले और लखनऊ-सुल्तानपुर हाईवे को पूरी तरह टोल फ्री कर दिया। घंटों तक चले इस हंगामे के कारण हाईवे पर यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। लंबा जाम लगा और यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। इस आंदोलन में भारतीय किसान यूनियन के कार्यकर्ता भी मौके पर पहुंचे और वकीलों को समर्थन दिया। धीरे-धीरे यह विवाद एक टोल प्लाजा की घटना से निकलकर बड़ा प्रशासनिक संकट बन गया। हालात बिगड़ते देख एसडीएम और सीओ मौके पर पहुंचे और वकीलों को समझाने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों की मांग साफ थी पहले गिरफ्तारी, फिर बातचीत।
पुलिस की कार्रवाई
पुलिस ने अधिवक्ता रत्नेश शुक्ला की तहरीर पर कार्रवाई करते हुए चार नामजद और दस अज्ञात टोल कर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद टोल प्लाजा के मैनेजर जगभान सिंह समेत तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही वकीलों का आक्रोश धीरे-धीरे शांत हुआ और स्थिति नियंत्रण में आने लगी। बाराबंकी के पुलिस अधीक्षक अर्पित विजयवर्गीय ने बताया कि फिलहाल स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और कानून व्यवस्था सामान्य हो चुकी है। उन्होंने कहा कि घटना में शामिल सभी दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। गिरफ्तारी के बाद हाईवे पर यातायात दोबारा सामान्य कर दिया गया और टोल व्यवस्था बहाल कर दी गई।
क्यों गंभीर है यह मामला?
बाराबंकी की यह घटना कोई अकेला मामला नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से हर साल टोल प्लाजा पर मारपीट, तोड़फोड़ और झगड़ों की खबरें आती रहती हैं। कभी सेना के जवान से विवाद, कभी आम नागरिक से, तो कभी किसानों और टोल कर्मियों के बीच टकराव, छोटा सा फास्टैग बैलेंस या लेन विवाद कुछ ही मिनटों में हिंसा में बदल जाता है। बाराबंकी की घटना इसलिए ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि यहां सवाल सिर्फ एक यात्री का नहीं, बल्कि एक अधिवक्ता की सुरक्षा और सम्मान का था। जब कानून की रक्षा करने वाले खुद सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग करने को मजबूर हो जाएं, तो यह सिस्टम की खामी की ओर इशारा करता है।
उठते सवाल: जवाब किसके पास?
इस घटना ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं- क्या टोल प्लाजा पर तैनात निजी सुरक्षा कर्मियों को कानून अपने हाथ में लेने की छूट होनी चाहिए? यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या टोल प्रबंधन और पुलिस के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत नहीं? अगर हर विवाद का अंत सड़क पर हंगामे से होगा, तो आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं। बाराबंकी का मामला सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि पूरे देश के टोल सिस्टम के लिए एक चेतावनी है। जरूरत है स्पष्ट नियमों, प्रशिक्षित कर्मियों और सख्त निगरानी की, ताकि टोल प्लाजा टैक्स वसूली का साधन रहें, टकराव का मैदान न बनें। अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आएंगी और हर बार सवाल सिर्फ टोल का नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था का होगा।


