रांची : उम्रकैद की सजा पाए अपराधी को गलत रिपोर्ट के आधार पर समय से पहले जेल से रिहा कराने के आरोप में फंसे दो पूर्व जेल अधिकारी रिटायरमेंट के बाद भी सरकारी तंत्र में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं। इन अधिकारियों में प्रवीण कुमार और कमलजीत सिंह का नाम प्रमुख है। इन दोनों पर आरोप है कि इन्होंने सजा पुनरीक्षण बोर्ड (Sentence Review Board) को गलत जानकारी देकर आजीवन कारावास की सजा पाए पवन तिवारी को वर्ष 2017 में समय से पहले जेल से रिहा कराया। लोकायुक्त ने इस मामले की जांच के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आदेश दिया था, लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हुआ है।
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आरोपों में फंसे दोनों अफसरों की स्थिति
जानकारी के अनुसार, प्रवीण कुमार जो AIG के पद से रिटायर हुए थे, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद कारा निरीक्षणालय में OSD (Officer on Special Duty) के पद पर नियुक्त किया गया था। उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है, फिर भी वे अनाधिकृत रूप से कार्यालय का काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि उन्हें दी जा रही सुविधाओं और वेतन का स्रोत क्या है?
वहीं, कमलजीत सिंह, जो उस समय प्रोबेशन ऑफिसर थे, रिटायरमेंट के बाद झारखंड आवास बोर्ड में कार्यालय अधीक्षक के रूप में काम कर रहे हैं। लोकायुक्त ने इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन कमलजीत सिंह ने उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद लोकायुक्त के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी गई।
पवन तिवारी को गलत रिपोर्ट से मिली रिहाई
मामला वर्ष 2000 का है, जब पवन तिवारी पर बद्री नारायण प्रसाद की हत्या का आरोप लगा था। इस केस में सत्र न्यायालय ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वर्ष 2003 में यह सजा हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखी थी।
जेल में रहने के दौरान पवन तिवारी पर अपनी पत्नी का फर्जी डेथ सर्टिफिकेट बनाकर अंतरिम जमानत लेने का भी आरोप लगा था। इसके बावजूद, जेल अधीक्षक प्रवीण कुमार और प्रोबेशन ऑफिसर कमलजीत सिंह ने सजा पुनरीक्षण बोर्ड को ऐसी रिपोर्ट भेजी, जिसमें पवन तिवारी के आचरण को बेहतर बताया गया।
इसी रिपोर्ट के आधार पर बोर्ड ने जून 2017 में पवन तिवारी को समय से पहले रिहा करने का फैसला किया। बाद में जब यह मामला उजागर हुआ, तो इसकी शिकायत लोकायुक्त से की गई।
लोकायुक्त की जांच और आदेश
लोकायुक्त जस्टिस डी.एन. उपाध्याय ने मामले की विस्तृत जांच के बाद दोनों अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया। साथ ही एक महीने के अंदर कार्रवाई कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, कमलजीत सिंह ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, और राज्य सरकार ने भी लोकायुक्त के आदेश को चुनौती देते हुए एक अलग याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
दोनों याचिकाओं पर न्यायमूर्ति आनंदा सेन की पीठ में सुनवाई हुई। कोर्ट ने 4 जनवरी 2024 को पारित अपने आदेश में कहा कि यह समझ से परे है कि लोकायुक्त के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार कैसे पीड़ित पक्ष हो सकती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब राज्य सरकार ही लोकायुक्त के आदेश को चुनौती दे रही है, तो उससे न्यायालय को स्वतंत्र और निष्पक्ष सहायता” की उम्मीद करना मुश्किल है। इसलिए न्यायालय ने अधिवक्ता कौशिक सरखेल को Amicus Curiae (न्यायालय के सहयोगी वकील) नियुक्त किया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे उन्हें सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराएं।
एक साल से लंबित है सुनवाई
इसके बाद मामला न्यायमूर्ति राजेश शंकर की अदालत में गया। वहां कमलजीत सिंह ने एक इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (IA) दायर कर लोकायुक्त के आदेश पर रोक लगाने की मांग की। लेकिन अदालत ने 18 जून 2024 को यह याचिका खारिज कर दी। बाद में यह मामला न्यायमूर्ति राजेश कुमार की पीठ में गया। उन्होंने 21 अगस्त 2024 को लोकायुक्त के आदेश पर अस्थायी रोक लगाई और कहा कि यह रोक याचिका के निष्पादन तक जारी रहेगी। हालांकि, इस आदेश के एक साल बाद तक भी मामला दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुआ है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के गंभीर मामलों में न्याय प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया जा रहा है।
अब निगाहें अगली सुनवाई पर
अब देखना यह होगा कि न्यायालय में यह मामला कब सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होता है और क्या लोकायुक्त के आदेश पर अमल होगा या नहीं। फिलहाल, दोनों अधिकारी आराम से पदों पर कार्यरत हैं, जबकि जिनके खिलाफ कार्रवाई का आदेश था, वे अब भी सरकारी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं। यह मामला न सिर्फ जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे गलत रिपोर्ट के सहारे न्यायिक फैसलों को प्रभावित किया जा सकता है। अगर समय रहते ऐसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भविष्य में न्याय प्रणाली के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर कर सकता है।


