देश : अयोध्या की हवा में अब राम मंदिर की भव्यता घुली हुई है। हर रोज हजारों श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए उमड़ते हैं, शहर की चकाचौंध बढ़ गई है, लेकिन इसी शहर के एक कोने में एक पुरानी याद अभी भी अधर में लटकी हुई है। बाबरी मस्जिद का नाम लेते ही इकबाल अंसारी के चेहरे पर गुस्सा और मलाल दोनों झलक उठते हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद के पक्ष में लंबी लड़ाई लड़ने वाले गवाह रहे हैं।
राम मंदिर की रौनक, लेकिन बाबरी मस्जिद की याद अधूरी
राम मंदिर के ठीक सामने वाली संकरी गली में उनका तीन कमरों वाला छोटा-सा मकान है। यहां से वे रोजाना भक्तों की भीड़ को देखते हैं। उन्हें खुशी होती है कि मंदिर ने अयोध्या को नई पहचान दी, लेकिन बाबरी की जगह नई मस्जिद न बन पाने का दर्द भी कम नहीं हुआ। उनके शब्दों में कहे तो “जब पांच एकड़ जमीन मस्जिद के लिए दी गई थी, तो उसमें म्यूजियम क्यों बनने लगा?” इकबाल अंसारी की आवाज में नाराजगी साफ झलकती है। वे कहते हैं, “हिंदुस्तान का मुसलमान मस्जिद के लिए अपना आखिरी पैसा भी दे सकता है, लेकिन म्यूजियम या अस्पताल के लिए चंदा नहीं देगा। जफर फारुकी ने धन्नीपुर मस्जिद में अस्पताल और म्यूजियम का बेतुका नक्शा ला दिया। उनकी सोच थी कि इसे दिखाकर देश-विदेश से पैसा आएगा और बिजनेस बढ़ेगा। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि यहां के मुसलमान बेवकूफ नहीं हैं।” इकबाल का गुस्सा छह साल पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ा है। 9 नवंबर 2019 को कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। राम मंदिर के लिए विवादित स्थल दिया गया, तो मुसलमानों को अयोध्या के धन्नीपुर में पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन। छह साल बाद राम मंदिर निर्माण अंतिम चरण में है, लेकिन मस्जिद का नक्शा तक पास नहीं हो सका।
आरटीआई खुलासा: एनओसी न मिलने से नक्शा रिजेक्ट
हाल ही में एक आरटीआई से यह राज खुला कि निर्माण के लिए जरूरी अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) न मिलने से मस्जिद का लेआउट प्लान ऑटोमैटिक रिजेक्ट हो गया। अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) ने 16 सितंबर 2025 को पत्रकार ओम प्रकाश सिंह के आरटीआई आवेदन का जवाब देते हुए बताया कि इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (आईआईसीएफ) ट्रस्ट ने प्रोजेक्ट फीस के रूप में महज चार लाख रुपये जमा किए हैं। निर्माण शुरू करने से पहले ट्रस्ट को लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण, अग्निशमन, नागरिक उड्डयन, सिंचाई, नगर निगम जैसे आठ विभागों से एनओसी लेनी पड़ती है। ये छह सालों में नहीं हो सकीं। एडीए के सचिव हेम सिंह कहते हैं, “23 जून 2021 को ट्रस्ट ने नक्शे के लिए आवेदन किया था, लेकिन बाद में उन्होंने पहला नक्शा वापस ले लिया। नवंबर 2024 में पुराना प्लान ऑटो रिजेक्ट हो गया, क्योंकि एनओसी लंबित थीं। ट्रस्ट ने 2023 से आज तक कोई संपर्क नहीं किया।”
धन्नीपुर – पांच एकड़ जमीन पर ठप पड़े सपने
धन्नीपुर अयोध्या से करीब 25 किलोमीटर दूर फैजाबाद-लखनऊ नेशनल हाईवे पर रौनाही थाने से सटा एक छोटा-सा मुस्लिम बहुल कस्बा है। यहां की आबादी लगभग 2500 है, जिसमें 60 प्रतिशत मुसलमान हैं। शाहगदा शाह मजार के आसपास की खाली पड़ी पांच एकड़ जमीन पर आईआईसीएफ ने ‘मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह’ मस्जिद बनाने का प्लान बनाया था। यह मस्जिद पांच मीनारों वाली होनी थी, जो पारंपरिक इंडो-इस्लामिक शैली में बनेगी। लेकिन फंड की कमी और नक्शा न पास होने से काम ठप पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अगस्त 2021 में ट्रस्ट ने चंदे की अपील की। बैंक अकाउंट की डिटेल्स सार्वजनिक कीं। नवंबर 2022 तक देशभर से करीब 40 लाख रुपये मिले, जिनमें 40 प्रतिशत हिंदुओं से, 30 प्रतिशत मुसलमानों से और बाकी कॉर्पोरेट डोनेशन थे। मजार पर मस्जिद की फोटो वाले पोस्टर लगे, जिनमें लिखा था ‘ए मास्टरपीस इन मेकिंग’। लोगों को उम्मीद थी कि मस्जिद के साथ मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल और स्कूल बनेगा। लेकिन वक्त गुजरता गया, पोस्टर हट गए, और काम शुरू न हुआ।
धन्नीपुर के लोग अब नई मस्जिद पर बात करने से कतराते हैं। मोहम्मद शमीम जैसे कुछ लोग खुलकर नाराजगी जताते हैं। वे कहते हैं, “पहले लगता था सरकार नहीं चाहती कि मस्जिद बने, लेकिन अब ट्रस्ट वाले ही काम नहीं बढ़ा रहे। कई बार तारीखें बताई गईं, ईंट-मोरंग मंगाई गई, जमीन नपवाई गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पहले कमेटी वाले 15 अगस्त को झंडा फहराने आते थे, अब कोई नहीं दिखता। सिर्फ बातें उड़ीं कि अस्पताल बनेगा, म्यूजियम बनेगा। न मस्जिद बनी, न उद्घाटन हुआ।” सोहराब खान पहले मस्जिद कमेटी से जुड़े थे, लेकिन देरी से नाराज होकर अलग हो गए। वे बताते हैं, “क्षेत्र के लोग नाउम्मीद हो चुके हैं। छह साल से वादे ही वादे हो रहे हैं। एनओसी न होने से नक्शा रिजेक्ट हुआ, तो ट्रस्ट की हवा-हवाई बातों से दिल टूट गया। कुछ ठोस दिखे, तभी सुकून मिलेगा।”
इकबाल अंसारी भी ट्रस्ट पर भरोसा खो चुके हैं। वे कहते हैं, “धन्नीपुर में नमाज के लिए मस्जिद बननी थी, लेकिन म्यूजियम और किचन की बातें होने लगीं। अयोध्या के हर मोहल्ले में मस्जिदें हैं, नई की क्या जरूरत? हमारे पुरखों ने बाबरी के लिए गवाही दी, केस लड़ा। फैसले के बाद जिम्मा जफर फारुकी के ट्रस्ट को सौंप दिया। उन्होंने स्थानीय मुसलमानों को छोड़कर बाहरी लोगों को शामिल किया। फैजाबाद की जनता ने चंदा देना बंद कर दिया। जो जानते नहीं, उन्हें क्यों दें? इस्लाम में एक दीवार खड़ी करके भी मस्जिद बना सकते हैं। फारुकी का विदेशी नक्शा कमाई का जरिया लगता है, इबादत का नहीं।” इकबाल सलाह देते हैं कि जमीन पर खेती करके हिंदू-मुस्लिम दोनों को अनाज बांटना चाहिए।
ट्रस्ट का दावा – नया नक्शा और नए स्टेकहोल्डर्स की तलाश
ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन से बात करने पर वे कहते हैं, “नक्शे के लिए अमाउंट जमा किया था, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। रिजेक्शन को ज्यादा तूल नहीं दे रहे। चेयरपर्सन जफर फारुकी नए स्टेकहोल्डर्स से मिल रहे हैं। फंड जुटाने और नए नक्शे पर काम हो रहा है। एक महीने में बदलाव के साथ एडीए से मिलेंगे।” म्यूजियम पर वे सफाई देते हैं, “धन्नीपुर अवध का हिस्सा है, जो गंगा-जमुनी तहजीब दिखाता है। फैसले के साथ ही हमने अस्पताल और 1857 की क्रांति के हीरो अहमद उल्ला शाह की याद में म्यूजियम का ऐलान किया। लोगों ने इंतजार किया, फंड की कमी से प्लान रुके। अब पुराने प्लान पर ही आगे बढ़ेंगे।” लेकिन अतहर मानते हैं कि एनओसी में देरी हुई, खासकर अग्निशमन विभाग ने साइट इंस्पेक्शन में रोड की चौड़ाई पर आपत्ति जताई। मस्जिद और अस्पताल के लिए 12 मीटर चौड़ी सड़क जरूरी है, जबकि मौजूदा रोड छह मीटर और मुख्य एप्रोच चार मीटर की है।
एडीए के हेम सिंह बताते हैं, “पांच एकड़ सरकारी जमीन पर निर्माण से पहले सभी एनओसी क्लियर करनी पड़ेंगी। प्रक्रिया लंबे समय से पेंडिंग थी, इसलिए मैप रिजेक्ट हो गया। जून 2021 का पहला आवेदन वापस लिया गया। 2023 से ट्रस्ट का कोई सदस्य नहीं आया। नई एप्लीकेशन के साथ दस्तावेज अपलोड करें, तभी अप्रूवल मिलेगा।” राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान एडीए ने बताया था कि नया नक्शा सौंपा गया है, लेकिन लैंड यूज कन्वर्जन चार्ज के एक करोड़ से ज्यादा जमा न होने से रुका। कुल मिलाकर, मस्जिद का अनुमानित खर्च 300 करोड़ है, लेकिन चार साल में सिर्फ एक करोड़ चंदा आया। ट्रस्ट ने एफसीआरए अप्रूवल के लिए चार सब-कमेटियां भंग कीं, ताकि विदेशी फंड आए।
अवध के मुसलमानों में नाउम्मीदी बढ़ रही है। इकबाल जैसे लोग कहते हैं कि मस्जिद की बजाय एकता पर जोर दें। ट्रस्ट का नया नक्शा अवधी शैली पर आधारित होगा, जो स्थानीय भावनाओं को ध्यान में रखेगा। लेकिन सवाल वही है – क्या लंबे इंतजार के बाद मस्जिद बनेगी, या यह कहानी अधूरी रह जाएगी? अयोध्या की सड़कों पर राम भक्ति की धुन गूंज रही है, लेकिन धन्नीपुर की खाली जमीन चुपचाप इंतजार कर रही है। शायद समय ही फैसला लेगा कि यह इंतजार कब खत्म होगा।


