Tuesday, July 21, 2026

SIR में मतदाता सूची से नाम हटने से नागरिकता जाने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का आया ये जवाब

नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फिर साफ कर दिया है कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है. आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक सीमित है. इसलिए कानून की स्थिति में कोई भ्रम नहीं है. कोई ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति का नाम SIR सूची में शामिल न करने का फैसला देता है, तो चुनाव आयोग को नागरिकता निर्धारण के लिए मामला संबंधित मंत्रालय को भेजना होगा. मतदाता सूची में नाम ना होने से नागरिकता अपने आप खत्म नहीं होती.

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि, उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची से नाम हटाए गए लोगों को PDS, अन्नपूर्णा योजना और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है. मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी.

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नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं

पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि बिहार SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि यदि कोई ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति का नाम SIR सूची में शामिल न करने का फैसला देता है, तो भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को नागरिकता निर्धारण के लिए मामला संबंधित मंत्रालय को भेजना होगा. जस्टिस बागची ने कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है. आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक सीमित है, इसलिए कानून की स्थिति में कोई भ्रम नहीं है.

याचिकाकर्ता वकील की दलील

पश्चिम बंगाल SIR से जुड़ी विधानसभा क्षेत्रवार जानकारी मांगने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के सामने याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी कि 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों के काम करने के तरीके से व्यावहारिक स्तर पर असंगतियां और देरी पैदा हो रही है.

उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनलों के कामकाज में बाधाएं हैं और इससे मामलों के निस्तारण पर असर पड़ रहा है. करीब 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं, जबकि जिन अपीलों का निस्तारण हो चुका है, उनमें लगभग 70% स्वीकार की गई हैं. अपीलों के लंबित रहने के दौरान लोगों को PDS, अन्य सरकारी योजनाओं और विभिन्न सरकारी सुविधाओं से बाहर किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि अक्टूबर में नगर निकाय चुनाव होने हैं और तब तक यह स्थिति बनी रह सकती है.

शंकरनारायण ने सुझाव दिया कि ट्रिब्यूनलों के आदेश वेबसाइट पर सार्वजनिक किए जाएं, ताकि प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो सके. उन्होंने यह भी दलील दी कि यदि किसी व्यक्ति के पास वैध भारतीय पासपोर्ट है, तो उसे नागरिकता के पर्याप्त प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.

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एयर नाऊ स्पेशल

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