Wednesday, July 22, 2026

झारखंड के इन 7 चीजों को मिला – GI Tag

झारखंड : झारखंड अपनी स्थापना के 25 साल पूरे कर रहा है, इन 25 सालों में झारखंड की अनगिनत कहानियों को आपने सुना होगा, देखा होगा , जाना और समझा होगा ऐसे ही कुछ कहानियों से हम आपको रुबरु करवाएंगे , जो झारखंड को लेकर आपकी जानकारियों को न सिर्फ समृद्ध करेंगे ब्लकि झारखंड को लेकर तय आपके विचारों को बेहतर करने का प्रयास भी करेंगे तो आइये, झारखंड के 25 वें सालगिरह के मौके पर इन्हीं जाने अनजाने पहचान से आपका परिचय कराते हैं।

झारखंड के 7 चीजों को GI Tag

झारखंड की पहाड़ियों के बीच बसे शांत गाँव इन दिनों पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं। जिसमें झारखंड की सोहराय पेंटिंग, कोहबर, भोगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, आदिवासी आभूषण, बांस शिल्प और करणी शॉल शामिल हैं। ये सभी चीजें झारखंड के अलग-अलग जिलों से जुड़ी हुई हैं और हर एक की अपनी खासियत है। झारखंड के इन 7 खास चीजों को GI Tag यानी (Geographical indication tag), मिला है। ये वो चीजें हैं, जो झारखंड की संस्कृति, जीवनशैली और कारीगरी का प्रतीक है।

आखिर GI Tag होता क्या है?

अब सवाल ये उठता है कि, आखिर GI Tag होता क्या है? दरअसल, GI टैग किसी भी कला या उत्पाद को उसकी असली पहचान देता है। यह बताता है कि यह चीज़ इसी इलाके की है और वहीं उसकी मूल जगह है। जैसे बनारस की साड़ी, दार्जलिंग की चाय, खाद्य पदार्थों में मिथिला का मखाना और ऐसे ही बहुत कुछ। ऐसे में GI Tag में शामिल products या इन चीजों की असली गुणवत्ता के बारे में पता चलता है, और लोग वहां की चीजों को प्राथमिकता देते हैं। जिससे नकली चीज़ों पर रोक लगती है। और कलाकारों को उनके काम का सही पैसा मिल पाता है। साथ ही देश-विदेश में इनकी मांग बढ़ती है, पर्यटक भी बढ़ते है और गांवों के लोगों को रोजगार मिलता है।

सोहराय और कोहबर पेंटिंग को GI टैग

अगर बात करें झारखंड की दीवारों पर बनी वो पेंटिंग्स, जिन्हें देखकर कोई भी रुक जाए और देखने पर मजबूर हो जाए। वो है हज़ारीबाग के आसपास के गाँवों में दीवारों पर बनी सोहराई पेंटिंग, जो सालों या दशकों से महिलाएँ अपने घरों की दीवारों को रंगों से नहीं, बल्कि अपनी कहानियों से सजाती रही हैं। इन्हीं कहानियों ने अब झारखंड को एक नई पहचान दी है। सोहराय और कोहबर पेंटिंग को GI टैग मिलने के बाद यह कला सिर्फ गाँव की दीवारों से निकलकर देश और दुनिया तक जा पहुँची है। सुबह का समय हो, शाम का या किसी त्योहार की हलचल, इन गाँवों की दीवारें हमेशा जीवन से भरी होती हैं। सोहराय पेंटिंग खास तौर पर तब बनती है जब खेतों में फसल कट जाती है। यह सिर्फ एक पेंटिंग नहीं, बल्कि फसलों की खुशबू, बारिश की याद और परिवार की मेहनत का जश्न है। गांव की महिलाएँ मिट्टी को गीला करके दीवारें तैयार करती हैं और फिर अलग-अलग तरह की मिट्टी से रंग बनाती हैं। इसमें कहीं गाय-बैल नज़र आते हैं, कहीं पेड़-पौधे, कहीं खेत और कहीं एक पूरा परिवार। यह पेंटिंग गांव की धड़कन जैसी लगती है, साधारण, नेचुरल और खूबसूरत।

कोहबर पेंटिंग की अपनी ही चमक है

कोहबर पेंटिंग की अपनी ही चमक है। शादी-ब्याह में जब घर सजता है, तब यह पेंटिंग दुल्हन वाले कमरे की दीवार पर बनाई जाती है। देखने वाले कहते हैं कि कोहबर बिना शादी का घर अधूरा लगता है। इसमें गोल आकृतियाँ, फूल-बेल, लहरें और कई खास निशान बनाए जाते हैं जिन्हें शुभ माना जाता है। कोहबर किसी दुल्हन की तरह ही सजता है, रंगों में, उम्मीदों में और परंपरा में। यही वजह है कि इसे देखने वाले समझ जाते हैं कि यह सिर्फ डिज़ाइन नहीं, बल्कि यह झारखंड की संस्कृति है। झारखंड का सोहराय और कोहबर पेंटिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। GI टैग मिलने से यहां के कलाकारों की जिंदगी बदल गयी है। इन दोनों पेंटिंग्स को GI टैग मिलने के बाद इन गाँवों की महिलाओं के चेहरे पर एक नई चमक आ गई है। पहले ये कला सिर्फ उनके घरों तक सीमित थी। अब यही कला पेंटिंग फ्रेम में, कपड़ों पर, बैगों पर और कई तरह के सामानों में जगह पा रही है। हज़ारीबाग की महिलाएँ अब अपने हुनर से कमाई कर रही हैं। कई महिलाएँ जो कभी घर से बाहर नहीं निकली थीं, अब अपने घर की दीवारों पर बनी कला को दुनिया तक भेज रही हैं।

गोड्डा जिले का भोगैया सिल्क अपनी अलग पहचान रखता है

लेकिन झारखंड की कहानी सिर्फ पेंटिंग तक सीमित नहीं है। यहां के सिल्क ने भी वही काम किया है जो पेंटिंग्स ने किया, दुनिया को अपनी ओर खींचने का। गोड्डा जिले का भोगैया सिल्क अपनी अलग पहचान रखता है। यह सिल्क देखने में चमकदार, पहनने में हल्का और छूने में बेहद मुलायम होता है। भोगैया गाँव के बुनकर इस कला को पीढ़ियों से सीखते आए हैं। उनकी उंगलियाँ रेशम को ऐसे बुनती हैं जैसे कोई गीत गाया जा रहा हो। मशीनें तो ना के बराबर होती है, मेहनत ज़्यादा, और नतीजा इतना सुंदर कि हर कोई इसे पसंद करे। इसे GI टैग मिलने के बाद, तो गाँव के हर बुनकर अपने हुनर की सही कीमत लगा रहे हैं।

रायकेला-खरसावां का कुचाई तसर सिल्क भी लोगों के बीच लोकप्रिय

इसी तरह सरायकेला-खरसावां का कुचाई तसर सिल्क भी लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। तसर रेशम जंगलों में पैदा होने वाले कोकून से मिलता है, और शायद इसी वजह से यह इतना शुद्ध लगता है। कुचाई का तसर नमी को रोकता नहीं जिसके कारण वह हल्का होता है और इसकी रफ्तार कपड़ों में दिखती है। इससे बनी साड़ियाँ और दुपट्टे देश के बड़े शहरों तक पहुँच चुके हैं। यहाँ के कारीगरों की मेहनत रंग-बिरंगे कपड़ों में साफ झलकती है। GI टैग मिलने पर इस सिल्क की कीमत के साथ-साथ कारीगरों की इज़्ज़त भी बढ़ गई है।

झारखंड के आदिवासी आभूषण

अब बात करते हैं झारखंड के आदिवासी आभूषणों की, जिनकी चमक कहीं भी नज़रें रोक सकती है। ये आभूषण अकसर चांदी, पीतल, तांबा, मनके, शंख, और मोतियों से बनी होती है। इन सब से बने आभूषण इतने खास होते हैं कि पहनने वाला भी खुद को खास महसूस करता है। इन आभूषण में शामिल हैं, हासिली यानी गले का हार, नथ, झूम यानी बड़े चांदी के झूमके और कंगन। आदिवासी समुदाय के लोग अपने आभूषण और श्रृगांर अपने संस्कृति से जुड़े रहने के लिए के लिए करते हैं। इनके आभूषणों के डिजाइन में कभी जंगल की हलचल होती है, कभी नदी का बहाव, कभी पेड़ों की रेखाएँ या चित्र बनी होती है। आदिवासी महिलाएँ अपनी खास आभूषणों को त्योहारों में पहनती हैं, ताकि उन्हें प्राकृति से जुड़ा हुआ महसूस हो और जब महिलाएं नृत्य करती हैं उस वक्त ये आभूषण आवाज़ करके अपनी उपस्थिति जताते हैं। इन्हें GI टैग मिलने पर यह कला अब सिर्फ झारखंड में ही नहीं बल्कि अब पूरे देश में फैल रही है।

झारखंड का  बांस शिल्प

झारखंड के गाँवों में एक और चीज़ बहुत खास है, बांस शिल्प। कई घरों की रसोई, खेत और आँगन अभी भी बांस की टोकरियों, चटाइयों और सूपों के बिना अधूरे लगते हैं। इस कला में गांव के कारीगरों का धैर्य और सटीकता दिखाई देती है। बांस को काटना, चिरना, मोड़ना और आकार देना,सब कुछ हाथ से होता है। आज की दुनिया में लोग प्राकृतिक चीज़ें ज्यादा पसंद कर रहे हैं, इसलिए बांस शिल्प की मांग लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि इसे GI टैग मिला है।

झारखंड की ठंड सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली करणी शॉल

झारखंड की ठंड में कोई सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली चीज़ है तो वह है कानी या करणी शॉल। यह शॉल हल्की होती है, गर्म होती है और बेहद खूबसूरत लगती है। इसमें स्थानीय पैटर्न बनते हैं और इसे बुनने में कई दिन लग जाते हैं। गांवों की बुजुर्ग महिलाएं इसे बुनते समय कहानियां सुनाती हैं और धीरे-धीरे धागे भी उसी कहानी में रंग जाते हैं। यह शॉल पहले से ही लोकप्रिय है और GI टैग के बाद इसकी खूबसूरती और बढ़ गयी है।

झारखंड की  कहानी  अब  दूर तक पहुँच रही है।

झारखंड की ये कलाएँ, शिल्प, आभूषण और कपड़े सिर्फ चीज़ें नहीं हैं। ये लोगों की ज़िंदगी, इतिहास और रोजमर्रा की कहानी हैं। दीवारों पर पेंटिंग हो या करघे पर बुनाई, हर कला एक कहानी सुनाती है। और अब जब इन चीज़ों को GI टैग मिल रहा है, तो झारखंड की यह कहानी और दूर तक पहुँच रही है। आने वाले कुछ सालों में झारखंड उन राज्यों में शामिल हो सकता है जिनके पास सबसे ज्यादा GI टैग वाले उत्पाद होंगे। इससे न सिर्फ कला और संस्कृति मजबूत होगी, बल्कि यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी। यही झारखंड की असली ताकत है। अपनी मिट्टी से जुड़ी कला, जो अब दुनिया का ध्यान खींच रही है।

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एयर नाऊ स्पेशल

देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा...

न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति....
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