रांची: झारखंड के साहिबगंज जिले के बोरियो एवं बरहेट प्रखंड से सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं में कथित भारी अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद पूरे राज्य में हड़कंप मच गया है। प्रारंभिक स्तर पर सामने आए तथ्यों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की निगरानी प्रणाली, पोर्टल सत्यापन प्रक्रिया और प्रशासनिक मॉनिटरिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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सूत्रों के अनुसार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत संचालित वृद्धा पेंशन, दिव्यांग पेंशन, आदिम जनजाति पेंशन एवं निराश्रित महिला पेंशन जैसी योजनाओं में बड़े पैमाने पर संदिग्ध लाभुकों की एंट्री पाए जाने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि वार्षिक सत्यापन अभियान के दौरान पंचायत स्तर पर जब लाभुकों की सूची का मिलान किया गया, तब कई ऐसे नाम सामने आए जो संबंधित पंचायत के निवासी ही नहीं बताए गए। कई लाभुक कथित रूप से काल्पनिक पाए गए, जबकि कई मामलों में आधार कार्ड, वोटर आईडी, आवेदन पत्र, बैंक विवरण एवं पोर्टल डेटा के बीच भारी विसंगतियां सामने आईं।
सूत्रों के अनुसार कुछ पंचायतों में दर्जनों ऐसे लाभुक पाए गए जिनका स्थानीय स्तर पर कोई अस्तित्व ही नहीं मिला। इसके बाद जब प्रखंड कार्यालय के रिकॉर्ड और पोर्टल डेटा का मिलान शुरू हुआ तो मामला बेहद गंभीर होता चला गया। जांच में सामने आए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले बताए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पोर्टल पर लगभग 19 हजार के आसपास लाभुकों की एंट्री दर्ज पाई गई, जबकि कार्यालयीय रिकॉर्ड में केवल लगभग 4 हजार लाभुकों का ही स्पष्ट दस्तावेजी आधार मिला। यानी करीब 14 से 15 हजार एंट्रियां संदिग्ध बताई जा रही हैं।
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सूत्रों का दावा है कि बड़ी संख्या में लाभुकों का पंजीकरण बिना सक्षम प्रशासनिक स्वीकृति के किया गया। कई मामलों में कथित रूप से फर्जी हस्ताक्षर, बिना सत्यापन एंट्री, अधूरे दस्तावेज और बिना कार्यालयीय अनुमति के लाभुक जोड़ने की बात भी सामने आई है। जांच के दौरान यह भी पाया गया कि हजारों लाभुकों से संबंधित मूल दस्तावेज कार्यालय में उपलब्ध ही नहीं हैं। जानकारों के अनुसार यदि प्रत्येक लाभुक के खाते में औसतन ₹1000 प्रतिमाह की राशि भी हस्तांतरित हुई हो, तो संभावित वित्तीय अनियमितता कई करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। सूत्रों का कहना है कि यदि बैंक खातों, भुगतान इतिहास, आधार प्रमाणीकरण और पोर्टल लॉगिन डेटा की तकनीकी जांच कराई गई, तो सरकारी राशि के कथित बड़े दुरुपयोग का खुलासा हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार मामले में अब तक दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण में कथित रूप से शामिल दो कंप्यूटर ऑपरेटरों को गिरफ्तार भी किया गया है। जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में दस्तावेज जब्त किए जाने की चर्चा है, जिनमें हजारों आवेदन पत्र, लाभुक संबंधित रिकॉर्ड एवं अन्य महत्वपूर्ण कागजात शामिल बताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि यदि करोड़ों रुपये की कथित अनियमित निकासी हुई है तो उसकी रिकवरी आखिर कैसे होगी? क्या केवल निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई कर मामले को सीमित किया जाएगा या फिर उन सभी लोगों की भूमिका की जांच होगी जिन्होंने वर्षों तक इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी की? प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि इतने बड़े स्तर पर कथित फर्जी एंट्री और भुगतान बिना किसी व्यापक नेटवर्क, मिलीभगत या सिस्टम फेल्योर के संभव नहीं हो सकता।
सूत्रों का कहना है कि जांच अब केवल डेटा एंट्री तक सीमित नहीं रह सकती। बैंक खातों, लाभुक सत्यापन प्रक्रिया, पंचायत स्तर की अनुशंसा, स्वीकृति प्रक्रिया, तकनीकी निगरानी एवं भुगतान अनुमोदन से जुड़े कई स्तरों की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है।
सबसे गंभीर बात यह मानी जा रही है कि कई संदिग्ध एंट्रियों में समान पैटर्न, समान प्रक्रिया और रिकॉर्ड मिसमैच पाए जाने की चर्चा है, जिससे संगठित नेटवर्क की आशंका और मजबूत हो गई है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यह केवल व्यक्तिगत स्तर की अनियमितता नहीं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से चल रहा संभावित सिंडिकेट भी हो सकता है।
जानकारों का मानना है कि इस तरह की कथित अनियमितताओं के पीछे NSAP पोर्टल की तकनीकी एवं सत्यापन संबंधी कमजोरियां भी एक बड़ा कारण हो सकती हैं। सूत्रों के अनुसार पोर्टल में पर्याप्त “चेक एंड बैलेंस” तंत्र की कमी, सीमित रियल-टाइम सत्यापन व्यवस्था एवं स्थानीय स्तर पर डेटा एंट्री मॉनिटरिंग की कमजोर प्रणाली के कारण बड़े पैमाने पर संदिग्ध एंट्रियां संभव हो सकीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते पोर्टल आधारित मल्टी-लेयर वेरिफिकेशन, आधार आधारित लाइव ऑडिट, पंचायत स्तरीय डिजिटल सत्यापन एवं ऑटोमैटिक फ्लैगिंग सिस्टम लागू किए गए होते, तो इस प्रकार की कथित गड़बड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता था।
अब प्रशासनिक हलकों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि यदि इसी प्रकार की तकनीकी, वित्तीय एवं जिला-स्तरीय स्वतंत्र जांच पूरे झारखंड में कराई गई, तो यह मामला केवल साहिबगंज तक सीमित नहीं रह सकता। आशंका जताई जा रही है कि राज्य के कई अन्य प्रखंडों, पंचायतों और जिलों में भी वर्षों से इसी पैटर्न पर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कथित फर्जी लाभुकों की एंट्री, बिना सत्यापन पंजीकरण एवं सरकारी राशि निकासी का संगठित खेल चलता रहा हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पोर्टल डेटा, आधार प्रमाणीकरण, बैंक खातों, पंचायत सत्यापन रिपोर्ट, लाभुकों के भौतिक सत्यापन एवं लॉगिन हिस्ट्री की राज्यव्यापी जांच कराई जाए, तो हजारों नहीं बल्कि लाखों संदिग्ध एंट्रियां सामने आ सकती हैं। सूत्रों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में संभावित अभियुक्तों की संख्या भी झारखंड स्तर पर लाखों तक पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा है।
फिलहाल विभिन्न योजनाओं से जुड़े लाभुकों के दस्तावेज, बैंक खातों, आधार प्रमाणीकरण, पंचायत सत्यापन रिपोर्ट, पोर्टल लॉगिन हिस्ट्री एवं भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की विस्तृत जांच जारी है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।क, करोड़ों की निकासी, दो गिरफ्तार और पूरे राज्य में फैले नेटवर्क की आशंका
झारखंड के साहिबगंज जिले के बोरियो एवं बरहेट प्रखंड से सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं में कथित भारी अनियमितताओं का मामला सामने आने के बाद पूरे राज्य में हड़कंप मच गया है। प्रारंभिक स्तर पर सामने आए तथ्यों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की निगरानी प्रणाली, पोर्टल सत्यापन प्रक्रिया और प्रशासनिक मॉनिटरिंग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के अनुसार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत संचालित वृद्धा पेंशन, दिव्यांग पेंशन, आदिम जनजाति पेंशन एवं निराश्रित महिला पेंशन जैसी योजनाओं में बड़े पैमाने पर संदिग्ध लाभुकों की एंट्री पाए जाने की चर्चा है।
बताया जा रहा है कि वार्षिक सत्यापन अभियान के दौरान पंचायत स्तर पर जब लाभुकों की सूची का मिलान किया गया, तब कई ऐसे नाम सामने आए जो संबंधित पंचायत के निवासी ही नहीं बताए गए। कई लाभुक कथित रूप से काल्पनिक पाए गए, जबकि कई मामलों में आधार कार्ड, वोटर आईडी, आवेदन पत्र, बैंक विवरण एवं पोर्टल डेटा के बीच भारी विसंगतियां सामने आईं। सूत्रों के अनुसार कुछ पंचायतों में दर्जनों ऐसे लाभुक पाए गए जिनका स्थानीय स्तर पर कोई अस्तित्व ही नहीं मिला। इसके बाद जब प्रखंड कार्यालय के रिकॉर्ड और पोर्टल डेटा का मिलान शुरू हुआ तो मामला बेहद गंभीर होता चला गया।
जांच में सामने आए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले बताए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पोर्टल पर लगभग 19 हजार के आसपास लाभुकों की एंट्री दर्ज पाई गई, जबकि कार्यालयीय रिकॉर्ड में केवल लगभग 4 हजार लाभुकों का ही स्पष्ट दस्तावेजी आधार मिला। यानी करीब 14 से 15 हजार एंट्रियां संदिग्ध बताई जा रही हैं।
सूत्रों का दावा है कि बड़ी संख्या में लाभुकों का पंजीकरण बिना सक्षम प्रशासनिक स्वीकृति के किया गया। कई मामलों में कथित रूप से फर्जी हस्ताक्षर, बिना सत्यापन एंट्री, अधूरे दस्तावेज और बिना कार्यालयीय अनुमति के लाभुक जोड़ने की बात भी सामने आई है। जांच के दौरान यह भी पाया गया कि हजारों लाभुकों से संबंधित मूल दस्तावेज कार्यालय में उपलब्ध ही नहीं हैं।
जानकारों के अनुसार यदि प्रत्येक लाभुक के खाते में औसतन ₹1000 प्रतिमाह की राशि भी हस्तांतरित हुई हो, तो संभावित वित्तीय अनियमितता कई करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। सूत्रों का कहना है कि यदि बैंक खातों, भुगतान इतिहास, आधार प्रमाणीकरण और पोर्टल लॉगिन डेटा की तकनीकी जांच कराई गई, तो सरकारी राशि के कथित बड़े दुरुपयोग का खुलासा हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार मामले में अब तक दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि इस पूरे प्रकरण में कथित रूप से शामिल दो कंप्यूटर ऑपरेटरों को गिरफ्तार भी किया गया है। जांच एजेंसियों द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में दस्तावेज जब्त किए जाने की चर्चा है, जिनमें हजारों आवेदन पत्र, लाभुक संबंधित रिकॉर्ड एवं अन्य महत्वपूर्ण कागजात शामिल बताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब यह उठ रहा है कि यदि करोड़ों रुपये की कथित अनियमित निकासी हुई है तो उसकी रिकवरी आखिर कैसे होगी? क्या केवल निचले स्तर के कर्मियों पर कार्रवाई कर मामले को सीमित किया जाएगा या फिर उन सभी लोगों की भूमिका की जांच होगी जिन्होंने वर्षों तक इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी की? प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि इतने बड़े स्तर पर कथित फर्जी एंट्री और भुगतान बिना किसी व्यापक नेटवर्क, मिलीभगत या सिस्टम फेल्योर के संभव नहीं हो सकता।
सूत्रों का कहना है कि जांच अब केवल डेटा एंट्री तक सीमित नहीं रह सकती। बैंक खातों, लाभुक सत्यापन प्रक्रिया, पंचायत स्तर की अनुशंसा, स्वीकृति प्रक्रिया, तकनीकी निगरानी एवं भुगतान अनुमोदन से जुड़े कई स्तरों की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है। सबसे गंभीर बात यह मानी जा रही है कि कई संदिग्ध एंट्रियों में समान पैटर्न, समान प्रक्रिया और रिकॉर्ड मिसमैच पाए जाने की चर्चा है, जिससे संगठित नेटवर्क की आशंका और मजबूत हो गई है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यह केवल व्यक्तिगत स्तर की अनियमितता नहीं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से चल रहा संभावित सिंडिकेट भी हो सकता है।
जानकारों का मानना है कि इस तरह की कथित अनियमितताओं के पीछे NSAP पोर्टल की तकनीकी एवं सत्यापन संबंधी कमजोरियां भी एक बड़ा कारण हो सकती हैं। सूत्रों के अनुसार पोर्टल में पर्याप्त “चेक एंड बैलेंस” तंत्र की कमी, सीमित रियल-टाइम सत्यापन व्यवस्था एवं स्थानीय स्तर पर डेटा एंट्री मॉनिटरिंग की कमजोर प्रणाली के कारण बड़े पैमाने पर संदिग्ध एंट्रियां संभव हो सकीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते पोर्टल आधारित मल्टी-लेयर वेरिफिकेशन, आधार आधारित लाइव ऑडिट, पंचायत स्तरीय डिजिटल सत्यापन एवं ऑटोमैटिक फ्लैगिंग सिस्टम लागू किए गए होते, तो इस प्रकार की कथित गड़बड़ियों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता था।
अब प्रशासनिक हलकों में सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि यदि इसी प्रकार की तकनीकी, वित्तीय एवं जिला-स्तरीय स्वतंत्र जांच पूरे झारखंड में कराई गई, तो यह मामला केवल साहिबगंज तक सीमित नहीं रह सकता। आशंका जताई जा रही है कि राज्य के कई अन्य प्रखंडों, पंचायतों और जिलों में भी वर्षों से इसी पैटर्न पर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कथित फर्जी लाभुकों की एंट्री, बिना सत्यापन पंजीकरण एवं सरकारी राशि निकासी का संगठित खेल चलता रहा हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पोर्टल डेटा, आधार प्रमाणीकरण, बैंक खातों, पंचायत सत्यापन रिपोर्ट, लाभुकों के भौतिक सत्यापन एवं लॉगिन हिस्ट्री की राज्यव्यापी जांच कराई जाए, तो हजारों नहीं बल्कि लाखों संदिग्ध एंट्रियां सामने आ सकती हैं। सूत्रों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में संभावित अभियुक्तों की संख्या भी झारखंड स्तर पर लाखों तक पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा है।
फिलहाल विभिन्न योजनाओं से जुड़े लाभुकों के दस्तावेज, बैंक खातों, आधार प्रमाणीकरण, पंचायत सत्यापन रिपोर्ट, पोर्टल लॉगिन हिस्ट्री एवं भुगतान संबंधी रिकॉर्ड की विस्तृत जांच जारी है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।



