Tuesday, July 21, 2026

Ranchi Mahajutan 2025: Jharkhand में आदिवासी बनाम कुड़मी महा टकराव, आरक्षण और पहचान की जंग

झारखंड की राजनीति और समाज इस समय एक गहरे विभाजन से गुजर रहे हैं। राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में जल्द ही ऐसा जमावड़ा होने जा रहा है, जहां केंद्र में सवाल होगा पहचान, अस्तित्व और अधिकार का। एक तरफ आदिवासी संगठन हैं, जो कुड़मी समाज को आदिवासी सूची में शामिल किए जाने की मांग का विरोध कर रहे हैं। तो दूसरी ओर कुड़मी समाज है, जो खुद को आदिवासी मानते हुए अपने अधिकारों की मांग पर अडिग है।
यह टकराव केवल सामाजिक पहचान का नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य और जनजातीय अधिकारों से जुड़ा बड़ा विवाद बन चुका है। कुड़मी समाज का कहना है कि उन्हें ऐतिहासिक रूप से हमेशा आदिवासी माना गया है।
1872 से लेकर 1931 तक की जनगणना रिपोर्ट में उनका नाम आदिवासी श्रेणी में दर्ज है। लेकिन 1948 में उन्हें अनुसूचित जनजाति की सूची से हटा दिया गया। कुड़मी नेताओं का तर्क है कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी, जिसे अब सुधारा जाना चाहिए।

कुड़मी समाज आदिवासी नहीं है

उनका दावा है कि उनका जीवन हमेशा जंगल, पहाड़ और खेती-किसानी से जुड़ा रहा है, और यही कारण है कि उन्हें आदिवासी दर्जा मिलना चाहिए। आदिवासी संगठन इस मांग का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि कुड़मी समाज आदिवासी नहीं है, बल्कि अलग जातीय पृष्ठभूमि से आता है। अगर उन्हें आदिवासी सूची में शामिल किया गया, तो इससे मौजूदा आदिवासी समुदायों के अधिकार और आरक्षण पर सीधा असर पड़ेगा। आदिवासी नेताओं का आरोप है कि कुड़मी समाज ने समय-समय पर अपनी पहचान बदली है—कभी खुद को कुर्मी कहा, कभी कुड़मी, कभी आर्य मूल तो कभी द्रविड़ बताया।

5 अक्टूबर को रांची के मोरहाबादी मैदान में विशाल महाजुटान

ऐसे में उनकी वंशावली और वास्तविक पहचान पर ही सवाल खड़े होते हैं। आदिवासी अस्तित्व बचाओ मोर्चा और कई अन्य संगठनों ने 5 अक्टूबर को रांची के मोरहाबादी मैदान में विशाल महाजुटान करने का ऐलान किया है। इस कार्यक्रम में हजारों आदिवासियों के जुटने की संभावना है। संगठनों का कहना है कि यह महाजुटान केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश होगा कि आदिवासी समाज अपने अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा। 3 अक्टूबर को कुड़मी समाज की बैठक इधर, कुड़मी समाज भी अपनी रणनीति बनाने में जुटा है। उन्होंने 3 अक्टूबर को जमशेदपुर में बड़ी बैठक बुलाने का निर्णय लिया है।

इस बैठक में यह तय किया जाएगा कि सरकार के सामने अपनी मांग किस तरीके से रखी जाए और आंदोलन की दिशा क्या हो। यानी आने वाले दिनों में रांची और जमशेदपुर दोनों जगह अलग-अलग पक्ष अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगे।
इतिहास और तर्क कुड़मी समाज के अनुसार, वे परंपरागत रूप से आदिवासी जीवन पद्धति के अनुयायी रहे हैं। उनकी संस्कृति, रहन-सहन और पेशा खेती-किसानी व प्रकृति पर आधारित रहा है। वहीं आदिवासी संगठनों का कहना है कि असली आदिवासी वही हैं जिनकी परंपरा और संस्कृति बिना किसी बदलाव के निरंतर चली आ रही है। उनके अनुसार कुड़मी समाज ने समय के साथ अपनी पहचान बदलने की कोशिश की है और यह मांग केवल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उठाई जा रही है। आदिवासी नेता अजय तिरकी का कहना है कि कुड़मी समाज को पहले यह तय करना होगा कि वे किसके वंशज हैं।

अगर कुड़मी समाज को आदिवासी दर्जा मिल जाता है, तो…

उनके मुताबिक बार-बार नाम और पहचान बदलने से कोई भी समुदाय आदिवासी नहीं हो जाता। उन्होंने साफ आरोप लगाया कि यह पूरा आंदोलन राजनीतिक मंशा से प्रेरित है और इसका सीधा असर आदिवासियों के अधिकारों पर पड़ेगा। इस पूरे विवाद का राजनीतिक पहलू भी उतना ही बड़ा है। आदिवासी संगठनों का आरोप है कि कुछ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां 2029 के चुनाव को ध्यान में रखकर कुड़मी समाज को खुश करने की कोशिश कर रही हैं। अगर कुड़मी समाज को आदिवासी दर्जा मिल जाता है, तो झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा तीनों राज्यों की राजनीति प्रभावित होगी। क्योंकि इन राज्यों में कुड़मी समाज की आबादी लाखों में है और यह एक बड़ा वोट बैंक साबित हो सकता है।

दोनों पक्षों की दलीलें कुड़मी समाज की दलील है कि उन्हें आदिवासी दर्जा न देकर उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है और यह अन्याय अब खत्म होना चाहिए। वहीं आदिवासी समाज का कहना है कि उनकी पहचान और अधिकार पहले से ही संकट में हैं। अगर कुड़मी समाज को आदिवासी सूची में शामिल किया गया, तो मौजूदा आदिवासियों के लिए आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ कमजोर हो जाएंगे। इस विवाद का असर अब केवल कागज़ों या बहसों तक सीमित नहीं है। गांवों और कस्बों में आदिवासी और कुड़मी समाज के बीच खींचतान दिखने लगी है।

रांची में महाजुटान आदिवासी संगठनों की शक्ति प्रदर्शन

कई जगहों पर आदिवासी संगठन बैठकें कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कुड़मी समाज भी झंडे-बैनर लेकर प्रदर्शन कर रहा है।
यह विवाद अब सीधे जनता के बीच पहुंच चुका है और सामाजिक संतुलन पर असर डालने लगा है।
अब निगाहें 3 अक्टूबर और 5 अक्टूबर पर टिकी हैं। जमशेदपुर की बैठक से कुड़मी समाज अपनी रणनीति तय करेगा, जबकि रांची का महाजुटान आदिवासी संगठनों की शक्ति का प्रदर्शन होगा। दोनों घटनाएं झारखंड की राजनीति और सामाजिक समीकरणों पर गहरा असर डालेंगी। यह टकराव आने वाले महीनों में और बड़ा रूप ले सकता है और राज्य की राजनीति को सीधे प्रभावित कर सकता है।

कुड़मी और आदिवासी समाज के बीच यह विवाद केवल दर्जे का नहीं है। यह एक संघर्ष है—इतिहास को लेकर, पहचान को लेकर और अधिकार को लेकर।आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मुद्दे को किस तरह सुलझाती है, क्योंकि अगर टकराव और बढ़ा, तो इसके सामाजिक और राजनीतिक परिणाम बहुत दूर तक जाएंगे।

spot_img

एयर नाऊ स्पेशल

देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा...

न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति....
- Advertisement -spot_img

सोशल मीडिया

25,000FansLike
40,000FollowersFollow
500FollowersFollow
113,000SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

ट्रेंडिंग ख़बर