दिल्ली: ग्रामीण रोजगार योजना में प्रस्तावित बदलावों को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। मनरेगा में बदलाव के विरोध में कांग्रेस शनिवार से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने जा रही है, जो 45 दिनों तक चलेगा। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार नए कानून के जरिए मनरेगा की मूल भावना को कमजोर कर रही है और राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल रही है। इसके साथ ही कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने भी नए कानून के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है और इसे राज्यों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया है।
कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक, तेलंगाना और पंजाब ने इस कानून के खिलाफ अपने-अपने विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित किए हैं। वहीं तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल ने भी खुलकर विरोध जताया है। विरोध करने वाले राज्यों की प्रमुख आपत्तियां यह हैं कि मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम क्यों हटाया गया? योजना को मांग-आधारित ढांचे से आपूर्ति-आधारित ढांचे में क्यों बदला गया? और राज्यों पर वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ाकर केंद्र का पूर्ण नियंत्रण क्यों थोपा जा रहा है?
विपक्षी दलों का कहना है कि यह बदलाव राज्य सरकारों की स्वायत्तता और ग्रामीणों के रोजगार अधिकारों पर सीधा हमला है। कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे ने कहा कि यदि नई ग्रामीण रोजगार योजना लागू होती है तो अगले पांच वर्षों में कर्नाटक सरकार को करीब 20,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा। उन्होंने साफ कहा कि कर्नाटक सरकार इस कानून को अदालत में चुनौती देगी। दूसरी ओर, एसबीआई रिसर्च के एक अध्ययन में दावा किया गया है कि यदि वीबी-जी राम जी (VB-G Ram G) एक्ट लागू होता है तो राज्यों को करीब 17,000 करोड़ रुपये का लाभ हो सकता है। यह आकलन पिछले सात वर्षों के मनरेगा आवंटन के आंकड़ों के आधार पर किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, नए ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच निधि का बंटवारा मानक मूल्यांकन (नॉर्मेटिव असेसमेंट) के आधार पर होगा, जिससे समानता और दक्षता सुनिश्चित की जा सकेगी।
नए मॉडल के तहत ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर बढ़ाने का दावा किया गया है। प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिनों तक वेतन-आधारित रोजगार की गारंटी देने का प्रावधान है। सरकार का कहना है कि यह योजना विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप रोजगार को समग्र ग्रामीण विकास से जोड़ती है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि नया कानून मनरेगा की मौजूदा कमियों को दूर करेगा और मजदूरों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करेगा। हालांकि विपक्ष का कहना है कि सरकार के दावों के विपरीत यह बदलाव जमीन पर ग्रामीण गरीबों और राज्यों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। मनरेगा में बदलाव को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच टकराव अब सड़कों से लेकर संसद और अदालत तक पहुंचने के आसार दिख रहे हैं।


