आज जब झारखंड के आदिवासी जिस जल, जंगल और जमीन को बचाने की बात करते हैं, असल में उसे कानूनन महफूज़ रखने की बुनियाद आज से तकरीबन सवा सौ साल पहले एक गरीब और साधारण परिवार से आने वाला एक 25 साल के नौजवान ने रखी थी. जो छोटानागपुर के जंगलों में तीर कमान लेकर चला करता था.
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जी हां हम बात कर रहे हैं धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की. आज उनकी 126वीं पुण्यतिथि है.और उनके शहदत दिवस पर, हम भगवान बिरसा मुंडा के जीवन से जुड़े उन किस्सों और पहलुओं को टटोलेंगे, जो उनके अदम्य साहस की गवाही देते हैं.
कैसे उनके उलगुलान ने झारखंड के आदिवासियों की अस्मिता की रक्षा की और उनकी पुरखों की जमीन को सूदखोरों और अंग्रेजों के हाथों कौड़ियों के भाव बिकने से बचाया?और कैसे आदिवासियों की जमीन बचाने की बुनियाद रखी जो आगे चलकर ऐतिहासिक सीएनटी एक्ट, जमीन को कानून संरक्षित करने का सबसे बड़ा आधार बना गया. कैसे गिरफ्तार हुए भगवान बिरसा मुंडा? गिरफ्तारी के महज कुछ ही महीनों में कैसे उनकी मौत हुई?
रांची जेल में हुई थी मौत
9 जून 1900 यह वह तारीख है. जब आदिवासियों के मसीहा बिरसा मुंडा का रांची की जेल में 25 साल की उम्र में निधन हो गया था. आज उनकी 126वीं शहादत दिवस मनायी जा रही है. बिरसा मुंडा की उम्र भले ही छोटी थी, लेकिन कम उम्र में ही वे आदिवासियों के भगवान बन गए थे. 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई जमींदारी और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ी. आदिवासी जंगलों को अपनी जननी मानते हैं.
इसी वजह से जब ब्रिटिशर्स ने इन जंगलों को हथियाने की कोशिशें शुरू कीं तो आदिवासियों में असंतोष पनपने लगा.ब्रिटिश लोगों ने आदिवासी कबीलों के सरदारों को महाजन का दर्जा दिया और लगान के नए नियम लागू किए. नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे आदिवासी कर्ज के जाल में फंसने लगे. उनकी जमीन भी उनके हाथों से जाने लगी. दूसरी ओर, अंग्रेजों ने इंडियन फॉरेस्ट एक्ट पास कर जंगलों पर कब्जा कर लिया. खेती करने के तरीकों पर बंदिशें लगाई जाने लगीं. कहा जाता है कि उलुगुलान से पहले बिरसा मुंडा 1858-1895 में सरदारी आंदोलन में हिस्सा लिया था.. उस दौरान छोटानागपुर के मुंडा और उरांव आदिवासियों द्वारा अपनी छीनी गई ज़मीनों और पारंपरिक अधिकारों को वापस पाने के लिए किया गया एक लंबा और महत्वपूर्ण संघर्ष था. जिसके बाद बिरसा मुंडा ने जमीनदारी के खिलाफ उलुगुलान शुरु किया.
1895 तक बिरसा आदिवासियों के मसीहा बन गये
1895 तक बिरसा मुंडा आदिवासियों के बीच बड़ा नाम बन गए थे. लोग उन्हें धरती बाबा नाम से पुकारने लगे धीरे -धीरे बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को दमनकारी शक्तियों के खिलाफ संगठित करना शुरु किया. अंग्रेजों और आदिवासियों में हिंसक झड़पें होने लगीं. इस उलुगुलान के बाद ही 1895 को बिरसा मुंडा को पहली बार गिरफ्तार किया गया. और फिर 2 साल बाद 30 नवंबर 1897 में वे जेल से बाहर निकलें.
तो तब क्रांतिकारी आंदोलन शुरु हुआ. और धीरे -धीरे 1899 तक बिरसा का आंदोलन उग्र हो चुका था. कई जगहों पर हत्याएं और आगजनी की घटनाएं होने लगी थी. इसी क्रम में 7 जनवरी को 1900 को लगभग 300- 400 आदिवासियों को लेकर खूंटी के एक थाने पर आक्रमण कर दिया गया. इस हमले में एक हवलदार, चार चौकीदार, एक यूरोपीय ठेकेदार और एक नौकर की मौत हो गई. जिसके बाद खूंटी स्थित सईल रकबा पहाड़ा में जिसे डूबांरी बुरु से जाना जाता है. जहां आदिवासियों का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया. और कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया था.
1900 में हुई अंग्रेजो और मुंडाओं के बीच हुई थी आखिरी लड़ाई
कहा जाता है कि 1900 में हुई अंग्रेजो और मुंडाओं के बीच यह आखिरी लड़ाई थी. बहरहाल, इस लड़ाई के बाद बिरसा मुंडा पर अंग्रेजों ने 500 रुपए का इनाम रखा था. उस समय के हिसाब से ये रकम काफी ज्यादा थी. कहा जाता है कि बिरसा की ही पहचान के लोगों ने 500 रुपए के लालच में उनके छिपे होने की पुलिस को सूचना दे दी. आखिरकार 3 फरवरी 1900 को बिरसा चक्रधरपुर के जंगल से गिरफ्तार कर लिए गए.
अंग्रेजों ने उन्हें रांची जेल के कालकोठरी में बंद कर दिया. जेल में बंद रहने के मजह चार महीनों के अंदर ही उनकी मौत हो गई थी. कहा जाता है कि यहां उनको धीमा जहर दिया गया. इसके चलते 9 जून 1900 को वे शहीद हो गए.हालांकि ब्रिटिश रिकॉड में बताया जाता है कि उनकी मौत हैजा के कारण हुई थी. उनके निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को आनन- फानन में कोकर पास डिस्टिलरी पुल के निकट अंतिम संस्कार कर दिया गया.यहीं पर उनकी समाधि बनाई गई है.
बिरसा के उलगुलान की गर्भ से निकला था CNT ACT
बहरहाल,बिरसा के उलगुलान की गर्भ से ही सीएनटी एक्ट जन्म लिया था जो आज आदिवासियों के जमीनो की सरंक्षण कर रहा है. सीएनटी अधिनियम जिसे छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 कहा जाता है. भगवान बिरसा मुंडा की निधन के आठ साल बाद अंग्रेजों ने आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए सीएनटी कानून बनाया. सीएनटी एक्ट की रुप रेखा जर्मन पादरी फादर जॉन बेप्टिस्ट हॉपमैन ने तैयार की थी जिसे 11 नवंबर 1908 को उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटा नागपुर और पलामू प्रमंडलों में लागू किया. सीएनटी को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किया गया है. जिससे आदिवासियों की जमीने कौड़ी भाव से बिकाने से बचने लगी.
क्या है CNT एक्ट
सीएनटी एक्ट की धारा 46 और 49 आदिवासियों की जमीन की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करता है. इसकी धारा 46(ए) के तहत आदिवासी भूमि किसी आदिवासी को ही हस्तांतरित हो सकती है. इसके लिए थानाक्षेत्र की बाध्यता भी रखी गयी है. किसी एक थानाक्षेत्र का कोई आदिवासी भी दूसरे थानाक्षेत्र के किसी आदिवासी की जमीन नहीं खरीद सकता. बहरहाल, यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता, जिस आदिवासियों की जल, जंगल. जमीन की रक्षा के लिए भगवान बिरास मुंडा में अपनी जान गांवई.
बिरसा के संघर्षों के बाद सीएनटी एक्ट बना. लेकिन विड़बना ही है कि आज भी जागरूकता के कमी और कानूनी पेचीदगियों के कारण कई आदिवासी परिवार वास्तविक अधिकार से वंचित हैं. नतीजन सवा सौ साल के बाद भी अपनी जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों को संघर्ष करना पड़ रहा है. इसलिए ये जरूरी है कि यह कानून मजह कागजों पर न रहें. बल्कि धरातल पर आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति सजग और मजबूत बनाएं. और भगवान बिरसा मुंडा के पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके संर्घष को जिंदा रखे.



