नई दिल्ली : 7 जनवरी की रात ठीक 1 बजे पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में अचानक हलचल मच गई। जब पूरा इलाका गहरी नींद में था, तब एक के बाद एक 32 जेसीबी और बुलडोज़र फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास पहुंच गए। सवाल यही उठा कि आधी रात को यह कार्रवाई क्यों की गई और जिस ज़मीन पर तोड़फोड़ हुई, क्या वह वास्तव में अवैध थी या काग़ज़ों की कमी ने हालात बिगाड़ दिए।
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आधी रात की कार्रवाई कैसे शुरू हुई
हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए दिल्ली नगर निगम (MCD) का अमला भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचा। यहां करीब 36,400 वर्ग फीट में बना एक बंद पड़ा बारात घर, एक प्राइवेट क्लिनिक और पार्किंग मौजूद थी। जैसे ही बुलडोज़र चले, इलाके में अफरा-तफरी मच गई।
पथराव और पुलिस कार्रवाई
बुलडोज़र चलते ही लोग घरों से बाहर निकल आए। भीड़ बढ़ती गई और हालात बिगड़ने लगे। आरोप है कि भीड़ ने MCD कर्मचारियों और पुलिस पर पत्थर और कांच की बोतलें फेंकी, जिसमें पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए। हालात काबू में आने के बाद पुलिस की मौजूदगी में कब्जे तोड़े गए। घटना के दो दिन बाद भी तुर्कमान गेट इलाके में हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। रैपिड एक्शन फोर्स के जवान गश्त कर रहे हैं, गलियों में बैरिकेडिंग है और कई दुकानें बंद पड़ी हैं। लोग अब भी डर और असमंजस में हैं।
मस्जिद कमेटी का दावा
फैज-ए-इलाही मस्जिद की मैनेजिंग कमेटी का कहना है कि जिस ज़मीन पर कार्रवाई हुई, वह 100 साल से ज्यादा पुरानी नोटिफाइड वक्फ संपत्ति है। कमेटी के जनरल सेक्रेटरी मतलूब करीम के अनुसार, 1913 के दस्तावेज़ों में 3 बीघा 17 बिस्वा ज़मीन का साफ़ ज़िक्र है। उनका आरोप है कि ये काग़ज़ दिल्ली वक्फ बोर्ड के पास होने चाहिए थे, लेकिन अदालत में पेश नहीं किए गए।
MCD का पक्ष
MCD का कहना है कि 1940 की डीड के अनुसार सिर्फ़ 0.195 एकड़ ज़मीन ही मस्जिद को ट्रांसफर हुई थी। नगर निगम कमिश्नर के 22 दिसंबर के आदेश में साफ़ कहा गया था कि इसके अलावा बची ज़मीन सरकारी है, जिस पर मस्जिद कमेटी या वक्फ बोर्ड का कोई अधिकार नहीं बनता। इसी आधार पर कार्रवाई की गई।
कम समय देने का आरोप
मस्जिद कमेटी का दावा है कि उन्होंने MCD को उपलब्ध दस्तावेज़ सौंप दिए थे और बाकी रिकॉर्ड जुटाने के लिए एक महीने का समय मांगा था। लेकिन प्रशासन ने सिर्फ़ 24 घंटे का वक्त दिया, जो पुराने ज़मीन विवाद के लिए बेहद कम बताया जा रहा है।
वक्फ बोर्ड की भूमिका पर सवाल
दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से कोर्ट में पेश वकील फरहत जहान रहमानी ने कहा कि पिछले दो साल से वक्फ बोर्ड का कोई पैनल नहीं है। सीईओ रिटायर हो चुके हैं और बिना स्पष्ट निर्देशों के दस्तावेज़ पेश करना संभव नहीं था। मस्जिद कमेटी की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे सीनियर वकील इरशाद हनीफ ने कार्रवाई को मनमानी बताया। उन्होंने कहा कि अगर ज़मीन वक्फ की है, तो फैसला सिर्फ़ वक्फ ट्रिब्यूनल कर सकता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर 2024 को रात या तड़के डिमॉलिशन पर रोक का निर्देश दिया था।
सेव इंडिया फाउंडेशन की भूमिका
इस मामले में सेव इंडिया फाउंडेशन और इसके प्रमुख प्रीत सिंह सिरोही की भूमिका भी चर्चा में है। सिरोही का दावा है कि मस्जिद के आसपास की ज़मीन PWD और MCD की है। वे लंबे समय से कथित अवैध धार्मिक ढांचों के खिलाफ याचिकाएं दायर करते रहे हैं।
सोशल मीडिया और जांच
पुलिस के मुताबिक हालात तब बिगड़े, जब सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैली कि मस्जिद को गिराया जा रहा है। इसके बाद भीड़ हिंसक हो गई। पथराव के मामले में अब तक 11 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है। CCTV फुटेज और वायरल वीडियो के आधार पर जांच जारी है। तुर्कमान गेट की यह घटना सिर्फ़ तोड़फोड़ की कहानी नहीं है। यह काग़ज़ों की लड़ाई, कानून की व्याख्या और प्रशासनिक फैसलों पर उठते सवालों की तस्वीर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आधी रात का बुलडोज़र भरोसे को तोड़ देता है और क्या अदालतों में लंबित मामलों का जवाब सड़क पर कार्रवाई से दिया जाना चाहिए। जवाब फिलहाल अदालतों के पास हैं, लेकिन तुर्कमान गेट की गलियों में डर और सवाल अभी भी कायम हैं।


