Thursday, July 23, 2026

SIR पर सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की सीधी दलील, वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से एक अहम घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मंगलवार को खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ अदालत के सामने अपनी बात रखी। यह मामला मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से जुड़ा है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने हुई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सुधारना नहीं, बल्कि मतदाताओं के नाम हटाना बन गया है। उन्होंने इसे इनक्लूजन नहीं, डिलीशन की प्रक्रिया करार दिया।

58 लाख नाम हटाने का आरोप

ममता बनर्जी ने अदालत को बताया कि अब तक करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं। इसके अलावा लगभग 88 लाख मतदाताओं को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी की श्रेणी में रखा गया है। उन्होंने कहा कि करीब तीन लाख आपत्तियां अभी भी लंबित हैं, जबकि अंतिम मतदाता सूची जारी होने की तारीख नजदीक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल जैसे राज्य में नामों की वर्तनी में फर्क आम बात है। Datta–Dutta, Roy-Ray, Ganguly-Ganguli जैसे उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग इन्हें मिसमैच मान रहा है, जबकि ये स्थानीय और भाषाई अंतर हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी वजहों से किसी नागरिक को वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

शादी के बाद सरनेम बदलने का उदाहरण

ममता बनर्जी ने भावनात्मक उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद महिलाएं अक्सर सरनेम बदलती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ सरनेम बदलने से किसी महिला का नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। उनके मुताबिक यह ज़मीनी हकीकत को न समझने का उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने SIR की टाइमिंग पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया ऐसे समय में चल रही है जब त्योहार, फसल का मौसम और पलायन जैसी स्थितियां होती हैं। ऐसे में आम लोगों को नोटिस मिलने और आपत्ति दर्ज कराने का पूरा मौका नहीं मिल पाता।

चुनिंदा राज्यों को निशाना बनाने का आरोप

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग गैर-बीजेपी शासित राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल, को चुन-चुन कर निशाना बना रहा है। उन्होंने सवाल किया कि अगर SIR इतनी जरूरी प्रक्रिया है, तो इसे असम जैसे राज्यों में उसी सख्ती से क्यों नहीं लागू किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि SIR प्रक्रिया में राज्य सरकार के अधिकारियों को शामिल नहीं किया जा रहा। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग ने माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं, जो कई मामलों में राज्य से बाहर बैठकर फैसले ले रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे गलतियों की आशंका बढ़ गई है।

सुप्रीम कोर्ट का आश्वासन

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की दलीलों को गंभीरता से सुना। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मामूली वर्तनी या भाषाई अंतर के आधार पर किसी भी निर्दोष नागरिक का नाम मतदाता सूची से नहीं हटने दिया जाएगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत या कानूनन अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाना जरूरी है। आधार कार्ड से जुड़े सवाल पर कोर्ट ने कहा कि यह मामला पहले से विचाराधीन है और इस पर फैसला सुरक्षित है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार की नागरिकता प्रमाण के रूप में सीमाएं हैं, लेकिन फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती।

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने कहा कि नोटिस में नामों को डिस्क्रेपेंट बताए जाने के कारण दर्ज किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान उठाए गए कुछ नए मुद्दे आयोग के पास औपचारिक रूप से नहीं पहुंचे हैं और उन्हें जांच के लिए समय चाहिए। चुनाव आयोग ने दावा किया कि राज्य सरकार ने SIR प्रक्रिया में पूरा सहयोग नहीं किया। आयोग के मुताबिक, जिला स्तर पर पर्याप्त अधिकारी नहीं मिलने के कारण माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े।

अगली सुनवाई सोमवार को

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि नए मुद्दों की जांच के लिए आयोग को समय दिया जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी। इस याचिका में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन सहित अन्य याचिकाकर्ता भी शामिल हैं। यह मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं, बल्कि मतदाता अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। अब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई है।

spot_img

एयर नाऊ स्पेशल

देश का एआई हब बनने की तैयारी कर रहा...

न्यूज़ डेस्क : झारखंड. ये नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? कोयला, लोहे की खदानें, मिनरल्स या शायद आदिवासी संस्कृति....
- Advertisement -spot_img

सोशल मीडिया

25,000FansLike
40,000FollowersFollow
500FollowersFollow
113,000SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

ट्रेंडिंग ख़बर