Sunday, September 20, 2026

भाषा और संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति : राज्यपाल

जमशेदपुर: राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने “22वें परसी महा एवं ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह” के समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि यह आयोजन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति, कला और अस्मिता का जीवंत उत्सव है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति हैं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का हार्दिक अभिनंदन करते हुए राज्यपाल ने कहा कि उनकी सादगी, संवेदनशीलता और जनजातीय उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता सम्पूर्ण देश के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक की उनकी जीवन-यात्रा देश की बेटियों और युवाओं के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।
राज्यपाल संतोष गंगवार ने कहा कि जमशेदपुर केवल एक औद्योगिक नगर ही नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों के सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों का सशक्त उदाहरण है। इस नगरी की सामाजिक समरसता, श्रमिक सम्मान और सांस्कृतिक गरिमा की सुदृढ़ नींव युगद्रष्टा जमशेदजी टाटा द्वारा रखी गई। राज्यपाल ने कहा कि ‘परसी महा’ संथाली भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना का महोत्सव है, जो लोक-संस्कृति, लोक-स्मृति और सामुदायिक एकता को सुदृढ़ करता है।
उन्होंने उल्लेख किया कि पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार द्वारा वर्ष 2003 में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाना संथाली भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। महान समाज सुधारक पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि ओल चिकी केवल एक लिपि नहीं, बल्कि संथाली समाज की सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक चेतना का प्रतीक है, जिसने संथाली भाषा को शिक्षा, साहित्य और शोध के क्षेत्र में सुदृढ़ आधार प्रदान किया है।
राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में देश ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प के साथ समावेशी विकास की दिशा में अग्रसर है, जहाँ जनजातीय समाज की भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष बल दिया जा रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन आने वाली पीढ़ियों में अपनी भाषा, लिपि और परंपरा के प्रति गर्व और आत्मसम्मान की भावना को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।
उन्होंने कहा कि लोक भवन, झारखण्ड जनजातीय भाषाओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सदैव सहयोगी रहेगा तथा ‘लोक भवन’ का द्वार राज्य के प्रत्येक नागरिक के लिए सदैव खुला है और ‘आमजनों के हितों के संरक्षक’ के रूप में यह अपनी भूमिका निभाता रहेगा।
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एयर नाऊ स्पेशल

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