न्यूज डेस्क : सोचिए, आपके पास एक ऐसी चीज है जिसकी कीमत हर महीने आपको मिलती है. लेकिन अचानक कोई कानून बनाकर कह दे कि अब इस चीज पर मिलने वाली कमाई का रास्ता ही बंद. आप क्या करेंगे? कुछ ऐसा ही मामला झारखंड के सामने खड़ा हो गया है. झारखंड की जमीन के नीचे कोयला है, आयरन ओर है और कई दूसरे खनिज हैं. इन खनिजों की वजह से राज्य को रॉयल्टी मिलती है. लेकिन इसके अलावा राज्य सरकार ने खनिज वाली जमीन पर एक अलग सेस यानी उपकर भी लगाया था. इससे राज्य को हर साल हजारों करोड़ रुपये की आमदनी हो रही थी.
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अब केंद्र सरकार ने ऐसा बिल पास किया है, जिसके बाद राज्यों की खनिजों और खनिज वाली जमीन पर इस तरह का अतिरिक्त टैक्स या सेस लगाने की ताकत खत्म हो सकती है. सवाल ये है कि आखिर केंद्र ने ऐसा क्यों किया? झारखंड को इससे कितना नुकसान हो सकता है? क्या इसका असर मुख्यमंत्री मंईंयां सम्मान योजना जैसी योजनाओं पर पड़ेगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या केंद्र और झारखंड सरकार के बीच पहले से चल रहा करीब 1.41 लाख करोड़ रुपये का बकाया वाला विवाद भी इससे प्रभावित होगा?
सबसे पहले समझते हैं कि पूरा मामला है क्या
देश में खनिज और खनिज वाली जमीन पर टैक्स या सेस लगाने का अधिकार किसके पास होगा, इसे लेकर केंद्र और राज्यों के बीच लंबे समय से कानूनी विवाद रहा है. अब 12 अगस्त यानी बुधवार को लोकसभा में खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया गया. विपक्ष के हंगामे के बीच पास हुए इस बिल में राज्यों की ओर से खनिजों और खनिज वाली जमीन पर अतिरिक्त कर या सेस लगाने की व्यवस्था पर रोक लगाने का प्रावधान है. लेकिन यहां एक शब्द बार बार आएगा, ‘सेस’. तो पहले इसे आसान भाषा में समझ लेते हैं. सेस यानी उपकर. ये किसी खास उद्देश्य के लिए लगाए जाने वाला अतिरिक्त कर होता है.
अब झारखंड के मामले में इसे समझिए. झारखंड खनिज संपदा के मामले में देश के सबसे अहम राज्यों में है. कोयला, आयरन ओर और दूसरे खनिज यहां की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभाते हैं. इसी को देखते हुए झारखंड सरकार ने साल 2024 में झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस एक्ट बनाया था. इस कानून के तहत खनिज वाली जमीन पर खनिज के प्रेषण यानी डिस्पैच के आधार पर सेस लगाने की व्यवस्था की गई. सरकार के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष में इससे करीब 8 हजार करोड़ रुपये की आमदनी हुई. इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने इससे 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा राजस्व मिलने का अनुमान लगाया था. यानी ये झारखंड सरकार के लिए कोई छोटी मोटी कमाई नहीं है.
इस बिल का असर मंईंया योजना पर पड़ेगा?
अब सवाल आता है कि इस पैसे का इस्तेमाल कहां होता है? झारखंड सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए. इनमें मुख्यमंत्री मंईंयां सम्मान योजना भी शामिल है. इस योजना के तहत राज्य की करीब 51 लाख महिला लाभुकों के खाते में हर महीने 2500 रुपये भेजे जाते हैं. ऐसे में अगर राज्य की अपनी अतिरिक्त खनिज आय का रास्ता बंद होता है, तो सरकार के सामने एक बड़ा वित्तीय सवाल खड़ा होगा. हालांकि यहां एक बात साफ साफ समझना जरूरी है. इस बिल से झारखंड को मिलने वाली रॉयल्टी सीधे तौर पर खत्म नहीं हो रही है. मामला रॉयल्टी से अलग राज्य सरकार की ओर से लगाए जाने वाले अतिरिक्त सेस का है.
नए बिल के प्रवाधान समझिए
अब बिल के मुख्य प्रावधान समझिए. पहला, राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर अपनी तरफ से नया टैक्स या सेस नहीं लगा सकेंगी. दूसरा, खनिजों और खनिज वाली जमीन से जुड़े कर या शुल्क पर केंद्र की तय व्यवस्था लागू होगी. और तीसरा, राज्यों की ओर से लगाए गए ऐसे करों को लेकर जो रकम अभी वसूल नहीं हुई है, उस पर भी इस कानून का असर पड़ सकता है. यहीं से झारखंड का मामला और पेचीदा हो जाता है.
केंद्र पर 1.36 करोड़ है बकाया
झारखंड लंबे समय से केंद्र सरकार से बड़ी रकम के भुगतान की मांग करता रहा है. राज्य की ओर से यह मांग पहले करीब 1 लाख 36 हजार करोड़ रुपये बताई जाती रही थी, जो अब करीब 1 लाख 41 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. इसमें एक बड़ा हिस्सा खनिज वाली जमीन के इस्तेमाल से जुड़े बकाये और उसके ब्याज का है. अब नए कानून के बाद इस पुराने बकाये और राज्य के सेस से जुड़े दावों पर भी कानूनी लड़ाई और तेज हो सकती है. यानी मामला सिर्फ एक टैक्स खत्म होने का नहीं है. मामला ये है कि झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्य की कमाई के एक बड़े स्रोत पर अब केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों की लड़ाई खड़ी हो गई है.
अगर राज्य की अतिरिक्त आमदनी कम होती है, तो सरकार के सामने दो रास्ते होंगे. या तो खर्च कम करे, या फिर दूसरे स्रोतों से पैसा जुटाए. और इसका असर आखिरकार सरकारी योजनाओं, विकास के काम और राज्य के बजट पर पड़ सकता है. हालांकि इस पूरे मामले का अंतिम असर अदालतों और कानून के लागू होने के बाद की स्थिति पर भी निर्भर करेगा. तो फिलहाल इतना ही. आपको क्या लगता है, खनिज संपदा से होने वाली कमाई पर राज्य सरकारों का अधिकार होना चाहिए या केंद्र को इस पर ज्यादा नियंत्रण मिलना चाहिए?

