रांची: झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष रबींद्रनाथ महतो ने बारबाडोस में चल रहे 68वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में बोलते हुए कहा कि उनके लिए ये बहुत गर्व की बात है। उन्होंने सत्र में “चोगम 2026 की ओर: लैंगिक समानता और पहुंच के नजरिए से इंसानियत को बढ़ावा” जैसे अहम मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि ये विषय भारत और झारखंड की सोच और प्राथमिकताओं से गहराई से जुड़ा है।
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भारत के संविधान और वेदों में निहित बराबरी का सिद्धांत
उन्होंने कहा कि भारत का पुराना सिद्धांत “वसुधैव कुटुम्बकम” यानी “दुनिया एक परिवार है” हमें सभी के साथ सम्मान और बराबरी से पेश आने की सीख देता है। ये विचार हमारे वेदों और उपनिषदों से आता है। भारत का संविधान भी यही कहता है। अनुच्छेद 14, 15 और 16 में सभी के लिए बराबरी, भेदभाव न करने और एकसमान मौके देने की बात है। अनुच्छेद 39 में एक जैसा काम करने वालों को एक जैसा वेतन देने की गारंटी है। यानी, हमारा कानून और नैतिकता इंसान को विकास का केंद्र मानते हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने हमेशा सबको साथ लेकर चलने, महिलाओं को ताकत देने और दिव्यांगों के लिए सुविधाएं बढ़ाने पर जोर दिया है। राष्ट्रमंडल के 56 देश लोकतंत्र, मानवाधिकार और सबको साथ लेकर चलने के मूल्यों से जुड़े हैं। 2026 में होने वाले चोगम सम्मेलन में इन मूल्यों को और मजबूत करना होगा, खासकर लैंगिक समानता और पहुंच के मामले में।
झारखंड के आदिवासी समुदायों में लैंगिक समानता की जीवंत परंपरा
उन्होंने ऋग्वेद की एक पंक्ति का जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि जहां औरतों का सम्मान होता है, वहां भगवान खुश रहते हैं। यानी, जब महिलाओं को सम्मान, मौके और बराबरी मिलती है, तो समाज तरक्की करता है। ये सिर्फ न्याय की बात नहीं, बल्कि पूरे समाज की उन्नति का सवाल है।
उन्होंने झारखंड के आदिवासी समुदायों की बात की और बताया कि उनकी सोच अथर्ववेद के विचार “पृथ्वी मेरी माँ है, और मैं उसकी संतान हूँ” से मिलती है। आदिवासी समाज में औरतें सम्मान, आजादी और समाज के फैसलों में हिस्सा लेती हैं। वे सिर्फ घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खेती, जंगल बचाने, पारंपरिक व्यापार और फैसले लेने में भी भागीदार हैं। गांव की सभाओं, सांस्कृतिक त्योहारों और परिवार में उनकी आवाज को सम्मान मिलता है। झारखंड के आदिवासी समुदायों में बराबरी की ये संस्कृति ये दिखाती है कि लैंगिक समानता कोई नई बात नहीं, बल्कि पुरानी और जीवंत परंपरा है।
झारखंड सरकार के युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महिलाओं को ताकत देने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री मैयां सम्मान योजना औरतों को आर्थिक मदद देती है, ताकि वे सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जी सकें। इसके अलावा, लड़कियों की पढ़ाई, मातृ स्वास्थ्य और महिला स्वयं सहायता समूहों जैसी योजनाओं ने गांव और शहरों में औरतों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। ये कदम सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी), खासकर लैंगिक समानता (एसडीजी 5) और अच्छे काम व आर्थिक विकास (एसडीजी 8) के साथ चलते हैं।
दुनियाभर में भारत ने महिलाओं के खिलाफ भेदभाव खत्म करने के समझौते (सी.ई.डी.ए.डब्ल्यू) और बीजिंग प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन जैसे बड़े समझौतों पर दस्तखत किए हैं। 1997 का विशाखा फैसला जैसे कानूनी कदमों ने औरतों के हक और सम्मान को और मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि 2026 के चोगम सम्मेलन की ओर बढ़ते हुए, राष्ट्रमंडल को ऐसा ढांचा बनाना चाहिए जो लैंगिक और पहुंच की समस्याओं को हल करे और अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को माने। भारत का मानना है कि पुरानी समझ, संवैधानिक गारंटी, आदिवासी प्रथाओं और नए सुधारों को मिलाकर काम करना चाहिए।
अंत में, उन्होंने ईशा उपनिषद का जिक्र करते हुए कहा कि इस ब्रह्मांड में सब कुछ ईश्वर से भरा है। इस नजरिए से हर इंसान, चाहे उसका लिंग, क्षमता या पृष्ठभूमि कुछ भी हो, सम्मान के लायक है। उन्होंने राष्ट्रमंडल से अपील की कि वो विविधता का सम्मान करे, औरतों को ताकत दे, पहुंच को अपनाए और “वसुधैव कुटुम्बकम” यानी एक दुनिया, एक परिवार के विचार को बढ़ावा दे।
इस सत्र में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के जनरल सेक्रेटरी स्टीफन ट्वीघ, एंटीगुआ और बरमुडा के स्पीकर, ओडिशा और गोवा विधानसभा के अध्यक्ष और कई देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

