Friday, October 9, 2026

GST से कोयला बाहर करने की मांग, झारखंड बोला, खनन का नुकसान हम उठाया तो टैक्स का फायदा सबको क्यों?

झारखंड देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक राज्यों में है। देश का करीब 23.27 फीसदी कोयला भंडार झारखंड में है।  लेकिन अब झारखंड ने इसी कोयले को लेकर GST काउंसिल में एक बड़ा सवाल उ है।

राज्य का कहना है कि कोयला झारखंड से निकलता है, उसकी वजह से जमीन जाती है, जंगल प्रभावित होते हैं, लोग विस्थापित होते हैं और प्रदूषण का असर भी राज्य को झेलना पड़ता है। लेकिन जब यही कोयला दूसरे राज्य के पावर प्लांट में पहुंचता है तो GST से मिलने वाला राजस्व उस राज्य को जाता है जहां कोयले की खपत होती है।

झारखंड पूछ रहा है कि संसाधन हमारे और उसकी कीमत भी हम चुकाएं, तो राजस्व का हिस्सा भी हमें मिलना चाहिए या नहीं?

झारखंड का कोयला, बिजली का फायदा दूसरे राज्यों को

झारखंड ने GST काउंसिल की बैठक में बताया कि देश के कुल कोयला भंडार का करीब 23.27 फीसदी हिस्सा उसके पास है। ओडिशा और पश्चिम बंगाल को जोड़ दें तो ये आंकड़ा करीब 57 फीसदी तक पहुंच जाता है।

लेकिन दूसरी तरफ पूरे पूर्वी क्षेत्र की देश की बिजली उत्पादन क्षमता में हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी ही है।

मामला थोड़ा उल्टा दिखाई देता है। जिन राज्यों से बड़े पैमाने पर कोयला निकलता है, वहां खनन का असर साफ दिखाई देता है। लेकिन वही कोयला जब दूसरे राज्यों के पावर प्लांट में जाता है तो मौजूदा GST व्यवस्था में टैक्स का फायदा उस राज्य को मिलता है जहां उसकी खपत होती है।

झारखंड इसी व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है।खदान सिर्फ कोयला नहीं निकालती, जमीन और जंगल भी लेती है। राज्य की दलील सिर्फ इतनी नहीं है कि उसे ज्यादा टैक्स चाहिए।

झारखंड ने कहा कि कोयला निकालने की पूरी प्रक्रिया की एक कीमत है। इसके लिए जमीन जाती है, जंगल कटते हैं, पानी और हवा पर असर पड़ता है। कई जगह लोगों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ती है।

और खदान बंद हो जाने के बाद भी कहानी खत्म नहीं होती। जमीन को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने, पर्यावरण सुधारने और प्रभावित इलाकों को संभालने का काम कई साल तक चलता है।यानी कोयला भले ही दूसरे राज्यों की बिजली जरूरत पूरी कर रहा हो, लेकिन उसके असर का एक बड़ा हिस्सा झारखंड में रह जाता है।

इसलिए कोयले को GST से बाहर करने की मांग

झारखंड ने इसका एक सीधा समाधान सुझाया है। राज्य चाहता है कि कोयले को GST से बाहर किया जाए और राज्यों को उस पर VAT लगाने की अनुमति दी जाए।

राज्य का कहना है कि सितंबर 2025 से पहले वाली 5 फीसदी दर को आधार माना जाए तो उत्पादक राज्य अंतरराज्यीय बिक्री पर 2 फीसदी CST भी लगा सकते हैं।

इससे झारखंड जैसे कोयला उत्पादक राज्यों का राजस्व बढ़ सकता है। वहीं राज्य का दावा है कि टैक्स का बोझ 18 फीसदी से घटकर 5 फीसदी होने पर बिजली बनाने की लागत भी कम हो सकती है।

यानी झारखंड इस मांग को सिर्फ अपने फायदे के तौर पर नहीं देख रहा। उसका तर्क है कि इसका फायदा बिजली उत्पादन की लागत कम होने के रूप में दूसरे राज्यों को भी मिल सकता है।

GST का पैसा कहां से आया, कहां गया, ये साफ क्यों नहीं?

झारखंड ने GST के आंकड़ों को लेकर भी एक अहम मांग रखी है।

राज्य चाहता है कि हर राज्य के लिए यह साफ-साफ दिखे कि कोई सामान कहां से निकला, कहां पहुंचा, कितना ITC मिला और आखिर में टैक्स का सेटलमेंट कैसे हुआ।

इसके लिए राज्यवार ‘सोर्स-डेस्टिनेशन-ITC-सेटेलमेंट स्टेटमेंट’ बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।

सीधी भाषा में कहें तो झारखंड चाहता है कि टैक्स का पूरा रास्ता दिखाई दे। खासकर उन राज्यों के मामले में जहां से बड़ी मात्रा में खनिज दूसरे राज्यों में जाता है।

झारखंड पर करीब 22 हजार करोड़ के बोझ का दावा

राज्य ने GST काउंसिल के सामने अपने राजस्व पर पड़ रहे दबाव का भी मुद्दा उठाया।

झारखंड के मुताबिक GST दरों के युक्तिकरण से करीब 4 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। VB-G RAM G यानी मनरेगा के फंड पैटर्न में बदलाव से करीब 4 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ बताया गया है। MMDR कानून में हालिया बदलावों से राज्य ने करीब 14 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया है।इन आंकड़ों को जोड़ें तो राज्य करीब 22 हजार करोड़ रुपये के राजस्व दबाव की बात कर रहा है।

इसके अलावा करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये की पुरानी बकाया राशि का भी राज्य ने जिक्र किया है। GST क्षतिपूर्ति उपकर खत्म होने से हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई के लिए भी झारखंड ने अलग व्यवस्था की मांग की है।

सिर्फ GST बदलने की बात नहीं, नया फॉर्मूला भी दिया

झारखंड ने ये नहीं कहा कि GST का पूरा गंतव्य आधारित सिस्टम ही खत्म कर दिया जाए।इसके बजाय राज्य ने एक अलग व्यवस्था का सुझाव दिया है। इसका नाम है ‘संसाधन-स्रोत एवं पारिस्थितिक संतुलन ढांचा’।इसमें देखा जाएगा कि किसी राज्य से कितना खनिज निकला, उसकी कीमत कितनी थी और उसमें से कितना खनिज दूसरे राज्यों में चला गया।

इसके साथ ये भी देखा जाएगा कि उस खनन के लिए कितनी जमीन और जंगल प्रभावित हुए, कितना प्रदूषण हुआ, कितने लोग प्रभावित या विस्थापित हुए और कितना पैसा पर्यावरण की बहाली पर लगाना पड़ेगा।आदिवासी इलाकों और भविष्य में इन क्षेत्रों को खनन के बाद आर्थिक रूप से संभालने की जरूरत को भी इस फॉर्मूले में शामिल करने की बात कही गई है।

झारखंड की बात आखिर है क्या?

पूरी बात को आसान भाषा में समझें तो झारखंड कह रहा है कि देश को विकास के लिए हमारे खनिज चाहिए तो ठीक है, लेकिन उस विकास की कीमत भी सिर्फ खनिज उत्पादक राज्य क्यों चुकाए?कोयला झारखंड से निकले, बिजली दूसरे राज्य में बने, टैक्स का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्य को मिले और खनन से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान झारखंड झेले, मौजूदा व्यवस्था में यही असंतुलन राज्य को खटक रहा है। झारखंड ने GST काउंसिल के सामने इसी असंतुलन को ठीक करने की मांग रखी है।

राज्य का कहना है कि सहकारी संघवाद का मतलब सिर्फ टैक्स का बंटवारा नहीं है। इसका मतलब ये भी है कि देश के विकास का फायदा और उसकी कीमत, दोनों का बंटवारा न्यायसंगत हो।और झारखंड अब इसी सवाल को GST काउंसिल के सामने मजबूती से रख रहा है।

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एयर नाऊ स्पेशल

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