डेस्क: धार्मिक पंचांग के अनुसार, इस साल गणेश उत्सव 14-24 सितंबर तक मनाया जाएगा। दस दिनों का यह उत्सव प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश को समर्पित है। इन दिनों भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इन दिनों विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है जिससे हमरी जीवन की सभी विघ्न और बाधाएं दूर होती है। शस्त्रों के मुताबिक भगवान गणेश की पूजा में हमें कुछ विशेष बातों का खास ध्यान रखा जाता है।
इसे भी पढ़ें: रेलवे के नए नियम जान लें यात्रा से पहले, महिला कोच में एंट्री पर 2500 जुर्माना
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश उत्सव की शुरुआत भाद्रपद यानी भादो शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है। जबकि इसका समापन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (यानी अनंत चतुर्दशी) के दिन होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 14 को सुबह 7 बजकर 06 मिनट से हो रही है। वहीं, भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तिथि की समाप्ति 25 सितंबर को रात 11 बजकर 06 मिनट पर होगी। भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन 25 सितंबर को किया जाएगा।
स्थानीय समय के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के आरंभ और प्रतिमा विसर्जन के समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।पंचांग के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 02 मिनट से दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक है। यानी इस साल गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न की पूजा के लिए 2 घंटे 28 मिनट का समय मिलेगा। हालांकि, स्थानीय समय के अनुसार, शुभ मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
धर्मशास्त्र के अनुसार, गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश की पूजा के लिए पूजा स्थल पर मिट्टी की मूर्ति की स्थापना सबसे अच्छा माना गया है। इसके अलावा धातु की मूर्ति या तस्वीर लगाकर भी पूजन किया जा सकता है। लेकिन मिट्टी की मूर्ति या तस्वीर लेते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें गणेश जी की सूंड बाईं ओर हो और शास्त्रों में गणेश जी की वामावर्ती (बाईं ओर मुड़ा हुआ) सूंड वाली मूर्ति या तस्वीर सबसे शुभ मानी गई है।
गणेश उत्सव पर गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करते वक्त इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि उसमें गणपति का वाहन यानी चूहा और मोदक स्पष्ट रूप से नजर आ रहा हो। शास्त्रीय नियम के अनुसार बैठी हुई मुद्रा में गणेश की प्रतिमा तस्वीर लगाना शुभ और मंगलकारी होता है।
भगवान गणेश की पूजा में पीले या लाल रंग के फूलों का प्रयोग करना बेहद लाभकारी होता है। परंपरानुसार, इस दिन गुड़हल के फूल का प्रयोग करना उत्तम है। इसके अलावा गणपति की पूजा में दूर्वा (घास) को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, दूर्वा के बिना गणेश जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। वहीं, गणेश की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग करना वर्जित किया गया है।
धर्म शास्त्र और धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान गणेश की पूजा में मोदक को जरूर शामिल करना चाहिए क्योंकि गणेश जी को मोदक अत्यंत प्रिय है और मोदक के अलावा आप भगवान गणेश को मोतीचूर के लड्डू का भोग भी लगा सकते हैं।
हमें आरती हमेशा खड़े होकर करना चाहिए। और बाती रूई का होना चाहिए और उसमें घी या तिल के तेल का इस्तेमाल करना चाहिए। आरती की थाली को भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि के पास 2 बार और चेहरे की तरफ एक बार घुमाना चाहिए। इस तरह कुल 7 बार आरती की थाली को गोलाकार (बाएं से दाएं की ओर) घुमाना चाहिए।

