नोएडा: उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आई यह घटना सिर्फ एक सड़क हादसा नहीं है, बल्कि सरकारी सिस्टम, प्रशासनिक संवेदनहीनता और बुनियादी लापरवाही का गंभीर उदाहरण बन चुकी है। एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत हो गई, लेकिन सवाल यह नहीं है कि वह कैसे मरा, बल्कि यह है कि क्या उसे मरने दिया गया। यह कहानी है 29 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की, जो करीब दो घंटे तक ज़िंदगी और मौत के बीच जूझता रहा, मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन सिस्टम मौके पर मौजूद रहते हुए भी हरकत में नहीं आया।
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हादसे की रात: कोहरा, अंधेरा और खुली खाई
घटना 16 जनवरी की रात की है। समय करीब 11 बजकर 45 मिनट। युवराज मेहता गुरुग्राम से नोएडा सेक्टर-150 स्थित अपने घर लौट रहा था। चारों ओर घना कोहरा था। जिस सड़क से वह गुजर रहा था, वहां न स्ट्रीट लाइट थी, न रिफ्लेक्टर, न कोई चेतावनी बोर्ड। उसी सड़क किनारे निर्माण कार्य के दौरान छोड़ी गई एक गहरी खुली खाई थी, जिसमें पानी भरा हुआ था। अंधेरे और कोहरे के कारण युवराज को खाई दिखाई नहीं दी और उसकी कार संतुलन खोते हुए सीधे पानी से भरी खाई में जा गिरी।
हादसे के बाद कार पूरी तरह पानी में नहीं डूबी थी। युवराज ने हिम्मत दिखाई, खुद को संभाला और कार से बाहर निकलकर उसकी छत पर खड़ा हो गया। आसपास कोई राहगीर नहीं था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने मोबाइल फोन की टॉर्च जलाई, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया और मदद की गुहार लगाता रहा। सबसे दर्दनाक पल तब आया, जब उसने अपने पिता को फोन कर बताया कि वह पानी में फँसा हुआ है और जल्दी मदद चाहिए।
सूचना के बावजूद सुस्त रेस्क्यू सिस्टम
रात करीब 12 बजकर 6 मिनट पर फायर ब्रिगेड को घटना की सूचना दी गई। करीब 12 बजकर 25 मिनट पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंच गईं। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी वहां मौजूद थे। इसके बावजूद कोई भी अधिकारी या कर्मचारी पानी में उतरने को तैयार नहीं हुआ। किसी ने कहा कि पानी बहुत ठंडा है, किसी ने कहा कि विज़िबिलिटी ज़ीरो है। इस दौरान युवराज लगातार कार की छत पर खड़ा होकर मदद के लिए आवाज लगाता रहा।
डेढ़ से दो घंटे तक जिंदगी की जंग
स्थानीय लोगों के मुताबिक युवराज करीब डेढ़ से दो घंटे तक ज़िंदगी और मौत के बीच फंसा रहा। जब सरकारी अमला हिचकिचाता रहा, तब एक स्थानीय युवक ने हिम्मत दिखाई। उसने अपनी कमर में रस्सी बांधी और पानी में उतरने की कोशिश की। वह करीब 50 मीटर तक आगे गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। धीरे-धीरे कार पूरी तरह पानी में समा गई और युवराज भी उसी पानी के साथ लापता हो गया।
एसडीआरएफ की देर से एंट्री
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल यानी एसडीआरएफ की टीम तड़के करीब 4 बजे घटनास्थल पर पहुंची। सुबह 6 बजे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलता रहा, लेकिन तब तक न युवराज को बचाया जा सका और न ही कार को बाहर निकाला गया। यह रेस्क्यू कम और इंतजार ज्यादा लग रहा था। इंतजार इस बात का कि अब कुछ बचा भी है या नहीं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोले कई सवाल
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि युवराज की मौत डूबने और दम घुटने से हुई। उसके फेफड़ों में बड़ी मात्रा में पानी पाया गया। शरीर पर किसी तरह की गंभीर बाहरी चोट नहीं थी। इसका सीधा मतलब यह है कि युवराज की मौत तत्काल नहीं हुई थी। अगर समय रहते सही रेस्क्यू किया जाता, अगर कोई तुरंत पानी में उतरता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी।
चार दिन तक पानी में फंसी रही कार
हैरानी की बात यह है कि हादसे के चार दिन बाद भी युवराज की कार पानी के अंदर ही फंसी रही। डिजास्टर मैनेजमेंट की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है, लेकिन इन चार दिनों में नोएडा की जिला प्रशासनिक टीम की मौजूदगी न के बराबर रही। जहां प्रशासन को मौके पर रहकर रेस्क्यू की निगरानी करनी चाहिए थी, वहां केवल औपचारिकताएं निभाई गईं।
पहले भी हो चुके थे हादसे
स्थानीय लोगों ने बताया कि जिस जगह यह हादसा हुआ, वहां पहले भी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। लोगों ने कई बार शिकायत की थी कि यह खाई खुली हुई है और यहां कोई बैरिकेड या चेतावनी बोर्ड नहीं लगाया गया है। इससे पहले एक ट्रक भी इसी खाई में गिर चुका था, जिसे स्थानीय लोगों ने रस्सियों के सहारे बाहर निकाला था। बावजूद इसके, सिस्टम ने कोई सबक नहीं लिया।
देर से हुई कार्रवाई
जब मामला तूल पकड़ने लगा और जनआक्रोश बढ़ा, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया। दो बिल्डर कंपनियों के खिलाफ लापरवाही की FIR दर्ज की गई। नोएडा अथॉरिटी के CEO को पद से हटा दिया गया। एक जूनियर इंजीनियर को निलंबित किया गया और मामले की जांच के लिए SIT का गठन किया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सारी कार्रवाई उस वक्त नहीं हो सकती थी, जब युवराज ज़िंदा था?
सिस्टम के सामने खड़े सवाल
यह मामला सिर्फ एक इंजीनियर की मौत का नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना है, जो तब तक नहीं जागता, जब तक किसी की जान न चली जाए। अगर सड़क पर लाइट होती, अगर खाई पर बैरिकेड होता, अगर रेस्क्यू तुरंत होता, तो आज युवराज की कहानी एक हादसे की कहानी नहीं होती। युवराज कोई नेता नहीं था, कोई अधिकारी नहीं था, कोई वीआईपी नहीं था। वह सिर्फ एक आम आदमी था, एक मेहनती इंजीनियर था। शायद यही वजह थी कि उसकी चीखें सिस्टम के कानों तक नहीं पहुंच सकीं। आज सवाल सिर्फ युवराज की मौत का नहीं है। सवाल यह है कि अगला युवराज कौन होगा, और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सिस्टम तब भी उतना ही सुस्त रहेगा?


