रांची: राजधानी के बरियातू रोड स्थित 8.86 एकड़ जमीन फर्जीवाड़ा मामले में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को राहत नहीं मिली है। ईडी के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार की अदालत ने सोमवार को उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हेमंत सोरेन के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, इसलिए अब इस मामले में मुकदमा चलेगा।
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140 पेज के आदेश में कोर्ट ने कहा
3 जून को सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को कोर्ट ने 140 पन्नों का विस्तृत आदेश जारी किया। अदालत ने कहा कि जांच में सामने आई सामग्री गंभीर संदेह पैदा करती है और आरोप तय करने के लिए यह पर्याप्त आधार है। कोर्ट ने हेमंत सोरेन की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका इस मामले से कोई संबंध नहीं है।
क्या है 8.86 एकड़ जमीन का मामला
यह मामला रांची के बरियातू रोड स्थित 8.86 एकड़ जमीन से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप है कि इस जमीन पर हेमंत सोरेन ने अवैध कब्जा किया था। जांच एजेंसी के मुताबिक वर्ष 2010-11 में मूल कब्जाधारियों को जबरन हटाकर जमीन पर कब्जा किया गया और बाद में भू-राजस्व अधिकारियों की मदद से फर्जी दस्तावेज तैयार कर जमीन को वैध दिखाने की कोशिश की गई।
ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि तत्कालीन राजस्व उपनिरीक्षक भानु प्रताप प्रसाद के पास से 17 मूल रजिस्टर और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद हुए थे। इन दस्तावेजों में इसी जमीन का उल्लेख बताया गया है। ईडी का दावा है कि हेमंत सोरेन के करीबी सहयोगी अभिषेक प्रसाद उर्फ पिंटू के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय से जमीन की वेरिफिकेशन कराने के निर्देश दिए गए थे।
सीएम ने आरोपों को बताया निराधार
हेमंत सोरेन की ओर से अदालत में कहा गया था कि यह जमीन किसी कथित अपराध से जुड़ी नहीं है। उनकी दलील थी कि जिस समय कब्जे का आरोप लगाया जा रहा है, उस दौरान आरोपी भानु प्रताप प्रसाद रांची में पदस्थापित ही नहीं थे। वह वर्ष 2019 में रांची आए थे। सोरेन पक्ष ने यह भी कहा कि जमीन से जुड़ा कोई फर्जीवाड़ा पूरा नहीं हुआ। न तो किसी रजिस्टर में हेमंत सोरेन का नाम दर्ज हुआ और न ही उनके नाम से कोई जाली दस्तावेज बनाया गया।
गवाहों के बयान पर उठाए सवाल
हेमंत सोरेन की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि ईडी जिन गवाहों के बयान का हवाला दे रही है, वे केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं। इसलिए उनके खिलाफ कोई ठोस मामला नहीं बनता। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी।
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