एयर नाउ स्पेशल: पश्चिम बंगाल इस वक्त जिस सियासी समंदर में डुबकी लगा रहा है, उसकी लहरें कोलकाता के कालीघाट से लेकर दिल्ली के लुटियंस और यहां तक कि वाशिंगटन के व्हाइट हाउस तक जा रही हैं। बंगाल की हवाओं में इस वक्त रबींद्र संगीत की मिठास कम, और ‘अस्मिता’ बनाम ‘अधिकार’ की गर्माहट ज्यादा है। एक तरफ वो 90 लाख चेहरे हैं जिनके नाम वोटर लिस्ट से गायब हो गए, तो दूसरी तरफ ‘घुसपैठिया’ शब्द है जो अब गाली नहीं, एक चुनावी हथियार बन चुका है।
Highlights:
SIR विवाद: 90 लाख नाम हटने से मचा बवाल
सबसे बड़ा मुद्दा बना है स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) का जिसके तहत चुनाव आयोग ने अपनी अंतिम वोटर लिस्ट जारी की और अचानक से खबर आती है कि 90 लाख लोगों के नाम गायब हैं। 90 लाख! ये कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। ये स्वीडन जैसे देश की आबादी के बराबर है। ममता बनर्जी का आरोप है कि ये एक ‘संवैधानिक डकैती’ है। उनका तर्क है कि ये वो लोग हैं जो सालों से बंगाल में रह रहे हैं, वोट दे रहे हैं, लेकिन अचानक एक कलम की स्याही से उन्हें ‘अदृश्य’ कर दिया गया। ममता दीदी इसे सड़क से कोर्ट तक ले गई हैं। उनका सीधा नैरेटिव है बीजेपी बंगालियों को बेदखल करना चाहती है।
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बीजेपी का जवाब: शुद्धिकरण का दावा
वहीं बीजेपी इसे ‘वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण’ कह रही है। उनका कहना है कि ये वो ‘घोस्ट वोटर्स’ हैं जिनके दम पर टीएमसी सत्ता की मलाई खा रही है। 2021 का चुनाव ‘जय श्री राम’ बनाम ‘चोपा’ (मुंह बंद करो) बीजेपी ने पूरी ताकत झोंकी थी, लेकिन ममता बनर्जी ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला ‘बंगाली बनाम बाहरी’। उन्होंने खुद को ‘बंगाल की बेटी’ बताया और बीजेपी के नेताओं को ‘दिल्ली के जमींदार’। नतीजा बंगाली अस्मिता के सामने हिंदुत्व का नैरेटिव थोड़ा फीका पड़ गया।
घुसपैठिया बना चुनावी हथियार
2026 के चुनाव में बीजेपी ने अपनी पिच बदल दिया है। अब वो सिर्फ ‘जय श्री राम’ पर निर्भर नहीं हैं। इस बार उनका सबसे बड़ा कीवर्ड है घुसपैठिया। बीजेपी के रणनीतिकारों ने समझ लिया है कि बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में जनसांख्यिकी बदल रही है। अब उनका नारा है ‘डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट’। वो कह रहे हैं कि अगर हम सत्ता में आए, तो एक-एक घुसपैठिए को चुन-चुनकर बांग्लादेश वापस भेजेंगे। ये ‘अवैध’ बनाम ‘वैध’ की वो लड़ाई है जिसमें बीजेपी को लगता है कि वो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर पाएगी। ममता बनर्जी मंझी हुई खिलाड़ी हैं।
ममता का पलटवार: केंद्र पर उठाए सवाल
इस मुद्दे पर ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को घेरते हुए बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी BSF की है, जो केंद्र के अधीन है। उनका तर्क है कि अगर घुसपैठ हो रही है तो इसके लिए राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार जिम्मेदार है। यह बयान बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस पूरे मामले में और तीखापन जोड़ दिया है। मालदा की रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाए। राहुल गांधी ने कहा कि देश के संसाधनों को विदेशी ताकतों के हाथों सौंपना देशभक्ति नहीं है। उन्होंने अमेरिका के साथ हुए समझौतों और उद्योगपतियों के मुद्दे को भी उठाया, जिससे राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
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तीन मोर्चों पर सियासी लड़ाई
बीजेपी ने घुसपैठ की बात की, तो ममता ने एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब गृह मंत्रालय को देना भारी पड़ रहा है। उन्होंने कहा”सीमा की जिम्मेदारी BSF की है। BSF अमित शाह के पास है। तो फिर घुसपैठ हो कैसे रही है? क्या केंद्र सरकार सो रही है या जानबूझकर रास्ता दे रही है?”लेकिन असली धमाका किया राहुल गांधी ने। मालदा की उस रैली में राहुल का तेवर एकदम अलग था। उन्होंने जो शब्द इस्तेमाल किए, वो शायद ही किसी ने पीएम मोदी के लिए इस्तेमाल किए हों। राहुल गांधी ने कहा कि जो प्रधानमंत्री देश का डेटा, देश के छोटे उद्योग और देश का कृषि क्षेत्र अमेरिका को ‘गिफ्ट’ कर दे, वो देशभक्त नहीं, देशद्रोही है। राहुल ने सीधा आरोप लगाया कि पीएम मोदी की कमान अब डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के साथ जो ट्रेड डील हुई है, वो भारत के मध्यम वर्ग की कमर तोड़ देगी।राहुल गांधी ने अडानी के लोकर भी हमला बोला राहुल ने कहा कि अडानी को भारत के बाहर कोई नहीं बचा सकता। अमेरिका को पता चल गया है कि क्या खिचड़ी पक रही है। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि अडानी का असली नाम ‘मोदी’ होना चाहिए क्योंकि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
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राहुल गांधी की आक्रामक बयानबाजी
अब सवाल उठता है कि इस पूरी खींचतान में जनता कहाँ है? बीजेपी के लिए बंगाल अब ‘करो या मरो’ की स्थिति है। 77 सीटें पिछली बार आईं, लेकिन सत्ता नहीं। इस बार वो ‘घुसपैठ’ के मुद्दे को इतना बड़ा बनाना चाहते हैं कि ‘बंगाली अस्मिता’ का मुद्दा दब जाए।वहीं टीएमसी यानी ममता बनर्जी के लिए ये उनकी विरासत को बचाने की लड़ाई है। वो दिखा रही हैं कि वो अकेली ऐसी नेता हैं जो दिल्ली के ‘दो शेरों’ (मोदी-शाह) के सामने सीना तानकर खड़ी हैं।इधर कांग्रेस-वामपंथ के लिए राहुल गांधी की आक्रामक बयानबाजी ये बता रही है कि कांग्रेस अब ‘ममता के भरोसे’ नहीं रहना चाहती। वो मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे अपने पुराने गढ़ को वापस पाने के लिए ममता और बीजेपी, दोनों पर हमले कर रही है। अब सबके जहन में एक सवाल चल रहा कि क्या 2026 का चुनाव ‘विनाशकारी’ होगा या नहीं और बंगाल की राजनीति में हिंसा और विवादों का पुराना रिश्ता है। लेकिन इस बार जो भाषा इस्तेमाल हो रही है ‘देशद्रोही’, ‘घुसपैठिया’, ‘बाहरी’ ये संकेत दे रहे हैं कि चुनाव आयोग के लिए ये परीक्षा की घड़ी होगी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और संवैधानिक सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR पर कड़ी टिप्पणी की है कि ‘संवैधानिक हक’ के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। अगर 90 लाख लोगों का नाम वाकई गलत कटा है, तो ये लोकतंत्र के लिए काला दिन होगा। और अगर ये वाकई अवैध लोग हैं, तो ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। खैर जो भी हो सियासत अपनी जगह है, लेकिन बंगाल की उस गरीब जनता का क्या, जिसका नाम वोटर लिस्ट से कट गया है? क्या उसे सिर्फ ‘वोट बैंक’ की तरह देखा जाएगा? क्या राहुल गांधी का पीएम मोदी को ‘देशद्रोही’ कहना सही है? या बीजेपी का ‘घुसपैठ’ वाला नैरेटिव इस बार ममता के ‘अस्मिता’ वाले कार्ड को काट पाएगा? सवाल ये भी कि क्या चुनाव सिर्फ़ शब्दों की बाजीगरी है? क्या 90 लाख लोगों के नाम कटना सिर्फ़ एक तकनीकी गड़बड़ी है या ये उस ‘सियासी सर्जरी’ की शुरुआत है जिसका असर दशकों तक रहेगा? ममता बनर्जी अपनी ‘अस्मिता’ बचा रही हैं, बीजेपी अपना ‘राष्ट्रवाद’ और राहुल गांधी अपनी ‘मोहब्बत की दुकान’। लेकिन इस दुकानदारी और खींचतान में बंगाल का वो आम आदमी कहां है, जिसे अपना भविष्य धुंधला नजर आ रहा है? सियासत अपनी जगह है, लेकिन जब संवैधानिक हक की बात आती है, तो सुप्रीम कोर्ट की वो टिप्पणी याद आती है कि ‘हक के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।’


