झारखंड : पश्चिम अफ्रीका के नाइजर में एक सशस्त्र उग्रवादी समूह द्वारा अपहरण किए गए झारखंड के पांच प्रवासी मजदूरों को आठ महीने बाद सुरक्षित रिहा कर दिया गया है. वे सभी शुक्रवार को वतन वापस लौट आए हैं. जानकारी के अनुसार, झारखंड सरकार, विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास और नियोक्ता कंपनी के बीच निरंतर समन्वय के चलते ही इन मजदूरों की सुरक्षित रिहाई संभव हो पाई है. रिहा हुए सभी पांच मजदूर गिरिडीह जिले के बगोदर के ही रहने वाले हैं. ये सभी प्रवासी मजदूर कल्पतरु पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड में काम कर रहे थे, जब पिछले साल अप्रैल में उनका अपहरण कर लिया गया था.
Highlights:
आठ महीने बाद सुरक्षित रिहाई
झारखंड सरकार के श्रम विभाग के तहत संचालित राज्य प्रवासी नियंत्रण कक्ष की प्रमुख शिखा लाकड़ा ने पुष्टि की कि झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर के रहने वाले पांचों श्रमिक सुरक्षित मुंबई पहुंच गये हैं. इस मामले की जानकारी देते हुए शिखा लाकड़ा ने कहा कि वर्तमान में पांचों मुंबई में ही. जहां उनकी अनिवार्य स्वास्थ जांच और आवश्यक सरकारी व कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जा रही है. वे 14 जनवरी को अपने घर लौंटेंग. गिरिडीह के डीसी रामनिवास यादव ने बताया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्य प्रवासी नियत्रंण कक्ष और विदेश मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से इन प्रवासियों की सुरक्षित वापसी संभव हो सकी है. उन्होंने कहा कि हमें निजी कंपनी के आधिकारियों से सूचना मिली की आठ महीने बंधक रहने के बाद श्रमिकों को रिहा कर दिया गया और वे शुक्रवार को विमान से मुंबई पहुंचे.
क्या है पूरा मामला
यह घटना 25 अप्रैल, 2025 को हुई थी. नाइजर में KPTL प्रोजेक्ट साइट के पास सशस्त्र उग्रवादियों ने उस समय अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी, जब भारतीय और स्थानीय मजदूर दोपहर का खाना खाने के बाद काम पर लौट रहे थे. तभी मोटरसाइकिल पर सवार हमलावरों ने मजदूरों के गाड़ी को रोका और झारखंड के इन पांच मजदूरों सहित एक स्थानीय नागरिक को अगवा कर लिया था. हालांकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपहरण की घटना के तुरंत बाद मामले में हस्तक्षेप किया और सीएम के आदेश पर SMCR ने विदेश मंत्रालय और नियामी (नाइजर) स्थित भारतीय दूतावास के साथ लगातार तालमेल बनाए रखा. मजदूरों की अनुपस्थिति के दौरान, गिरिडीह जिला प्रशासन के माध्यम से उनके परिवारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं जैसे राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड, मनरेगा, पेंशन और उज्ज्वला योजना का लाभ सुनिश्चित कराया गया. कंपनी को निर्देश दिया गया था कि वह मजदूरों का वेतन उनके बैंक खातों में जमा करना जारी रखे.
झारखंड में पलायन एक गंभीर समस्या
झारखंड से हर साल युवा काम की तलाश में विदेश जाते हैं. क्योंकि झारखंड में पलायन और रोजगार एक ऐसी गंभीर समस्या बन चुकी है, जिससे राज्य का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं है. स्थानीय स्तर पर पर्याप्त अवसरों के अभाव में, यहां के युवाओं के पास आजीविका के लिए विदेशों में प्रवास करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता. हर साल झारखंड से हजारों की संख्या में युवा अपने बेहतर भविष्य की तलाश में ओमान, सऊदी अरब, कतर और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्थानों का रुख करते हैं.
ईसीआर के तहत
इंडिया टूडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड के गिरिडीह, बोकारो, चतरा, कोडरमा और हजारीबाग ऐसे जिले हैं, जहां से हजारों की संख्या में लोग अरब और अफ्रीकी देशों में काम करने जाते रहते हैं. 21 जुलाई, 2023 को संसद में विदेश मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, झारखंड के 8,704 मजदूर केवल इमिग्रेशन चेक रिक्वायर्ड (ईसीआर) कंट्री में काम करने जा चुके थे. मंत्रालय के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर, सऊदी अरब, अफगानिस्तान सहित कुल 18 देश ईसीआर के तहत आते हैं. इमिग्रेशन ऐक्ट 1983 के मुताबिक, अगर कोई भारतीय इन देशों में रोजगार के लिए जाते हैं, तो उसे यात्रा से पहले इमिग्रेशन क्लियरेंस लेना होता है. यानी उन्हें वर्क वीजा दिखाना होता है क्योंकि इन देशों को मजदूरों के लिए कामकाज के लिहाज से असुरक्षित माना जाता है. गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड के लोग सबसे अधिक संख्या में इन देशों में जाते हैं. बगोदर विधायक विनोद सिंह कहते हैं, राज्य के इन इलाकों में कोई उद्योग की कमी है. देश भर में सबसे कम मनरेगा मजदूरी (255 रुपए) झारखंड में है. हमारे पास श्रम ही तो है, वही बेचने लोग जा रहे हैं.”
पीओई की प्रतिक्रिया
विदेश मंत्रालय के तहत आने वाले उत्प्रवासी संरक्षण कार्यालय का मुख्य काम ईसीआर देशों में जानेवाले मजदूरों के मूवमेंट पर निगरानी रखना है. रांची में इस कार्यालय की स्थापना 2023 में हुई है. इसके मुख्य अधिकारी प्रोटेक्टर ऑफ इमिग्रेंट (पीओई) सुशील कुमार कहते हैं, “नियम के मुताबिक इन मजदूरों को वे हायर कर सकते हैं जिन्हें मंत्रालय की तरफ से रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी) मिला हुआ है.” मगर, झारखंड में मजदूर हायर करने वाली ऐसी कंपनियां दक्षिण भारतीय या मुंबई की हैं. वे एजेंटों के जरिए मजदूरों को मुंबई या तमिलनाडु जैसे जगहों पर बुलाती हैं और बाकी कागजी कार्रवाई वहीं होती है. धनंजय भी सूद पर लिए 70,000 रुपए स्थानीय एजेंट को देकर कमाने गए थे.
इन जैसे मजदूरों के देश के बाहर काम करने जाने से पहले उत्प्रवासी कार्यालय इन्हें इनके अधिकारों और मुश्किल में फंसने पर सहायता संबंधी जानकारी देने के लिए भी जिम्मेदार है. हालांकि रांची उत्प्रवासी कार्यालय के अधिकारियों का कहना है कि इन मजदूरों के जाने से पहले जानकारी ही नहीं होती है, तो हम इन्हें ट्रेनिंग कैसे देंगे. वहीं झारखंड से प्रवासी मजदूरों के विदेश जाने को लेकर आंकड़े बताते हैं कि झारखंड के प्रवासी मजदूरों की बीते तीन सालों में ईसीआर कंट्री में 91 की जान गई है. वहीं 14,267 झारखंडी मजदूर विदेशों में अब भी काम कर रहे हैं. साल 2021 -2024तक 12,49,005 स्किल्ड सेमी और अनस्किल्ड लेबर ईसीआर कंट्री में गए हैं.
झारखंड के उन परिवारों के लिए राहत और खुशी की खबर आई है, जिनके अपने पिछले कई महीनों से सात समंदर पार फंसे हुए थे. नाइजर में अगवा किए गए सभी 5 मजदूर सफलतापूर्वक रिहा करा लिए गए हैं. मकर सक्रांति के मौके पर ये सभी प्रवासी मजदूर अब अपने परिवार से मिल सकेंगे.


