अयोध्या : श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में हुआ ध्वजारोहण समारोह सिर्फ एक साधारण पूजा-अर्चना का कार्यक्रम नहीं, बल्कि हिन्दुत्व की व्यापक अवधारणा और सामाजिक समरसता का गहरा संदेश लेकर आया। यह समारोह राममंदिर की भव्यता के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को जोड़ने और वसुधैव कुटुंबकम् के भाव को फिर से स्थापित करने वाला ऐतिहासिक क्षण साबित हुआ। इस आयोजन में हर पहलू को बहुत सोच-समझकर शामिल किया गया। कार्यक्रम की पूरी संरचना यह दर्शाती रही कि नागरिकता, जाति, वर्ग, भाषा या प्रांत से ऊपर उठकर पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोना ही श्रीराम के जीवन का मूल संदेश है। यही कारण है कि मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखी पंक्ति ‘जाति पाति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि को होई’ पूरे वातावरण को राममय बना रही थी और कार्यक्रम की मूल भावना को दर्शा रही थी।
Highlights:
हिन्दुत्व और विश्वगुरु की परिकल्पना का जीवंत प्रतीक

भारत को विश्व गुरु बनाने की अवधारणा तभी सार्थक मानी जाती है जब भारत से दुनिया को शांति, सद्भाव और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश मिले। अयोध्या में हुए इस ध्वजारोहण ने ठीक यही भाव सामने रखा। कार्यक्रम यह भी दिखाता है कि समाज को जाति-धर्म के नाम पर विभाजित करने की कोशिशें कभी भारतीय संस्कृति के सामने टिक नहीं सकतीं। प्रयागराज कुम्भ में भी हिन्दू समाज अपनी एकजुटता दिखा चुका है और अयोध्या के इस आयोजन ने उसी भावना को और मजबूत किया।
राजनीति या प्रभावशाली वर्ग नहीं

ध्वजारोहण कार्यक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह था कि इसमें राजनीति या बड़े उद्योगपतियों को विशेष महत्व नहीं दिया गया। इसके बजाय उन लोगों को प्रमुखता दी गई जो समाज के अंतिम पायदान पर होते हुए भी निरंतर समाज सेवा और सांस्कृतिक योगदान में लगे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और आसपास के करीब ढाई दर्जन जिलों के लोगों को टिकट देकर बुलाया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह आयोजन समाज के हर वर्ग के सम्मान का प्रतीक है।
कार्यक्रम आयोजन में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का भाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंच परिवर्तन सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम में पूरी तरह स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाया गया। आयोजन की संपूर्ण जिम्मेदारी प्रबंधन कंपनियों को न देकर विश्व हिन्दू परिषद और ट्रस्ट ने स्वयं संभाली। अतिथियों का स्वागत तिलक, पुष्पवर्षा और भारतीय परंपराओं के अनुसार किया गया। हर व्यवस्था में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई दी।
विनम्रता, अनुशासन और नागरिक कर्तव्य का अनूठा उदाहरण
कार्यक्रम में आने वाले सभी अतिथियों और आमंत्रितों ने निर्देशों का पूरी तरह पालन किया। न कहीं अव्यवस्था दिखी, न भीड़ का शोर। सभी लोग अपने निर्धारित स्थान पर शांतिपूर्वक बैठे, कार्यक्रम सुना और फिर अनुशासन के साथ रामलला के दर्शन किए। यह अनुशासन स्वयं में नागरिक कर्तव्यों का सजीव उदाहरण है।
पूरे परिसर में पर्यावरण संरक्षण की छाप
70 एकड़ में फैले श्रीराम मंदिर परिसर में लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र हरा-भरा है। पक्षियों और अन्य जीवों के लिए पंचवटी बनाई गई है, जबकि बाकी हिस्सों में पौधरोपण किया गया है। जल संरक्षण के लिए आधुनिक वाटर हार्वेस्टिंग प्लांट भी शुरू कर दिया गया है। यह दिखाता है कि मंदिर सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का भी प्रतीक बन रहा है।
56 जातियों और सभी समुदायों को मिला प्रतिनिधित्व
ध्वजारोहण समारोह में सामाजिक समरसता पूरी तरह दिखाई दी। समाज की लगभग 56 जातियों को प्रतिनिधित्व दिया गया। इनमें घुमंतू, दलित, वंचित, आदिवासी, वनवासी, अघोरी, कहार, बारी, नाई, कुम्हार, गड़रिया, यादव, लोहा, बढ़ई, पासी, वाल्मीकि, रैदास, कुर्मी, नट, कंजर जैसे जातियों के साथ बौद्ध, जैन, सिख समाज को भी आमंत्रण दिया गया। हर चेहरे पर खुशी और सम्मान का भाव दिख रहा था। श्रेष्ठ-कनिष्ठ का भाव कहीं नहीं था, सिर्फ एकता और भाईचारा।
लोकल फॉर वोकल का प्रत्यक्ष उदाहरण
ट्रस्ट ने करीब 6000 लोगों को निमंत्रण भेजा, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोध्या जिले के थे। सभी 835 ग्राम प्रधानों को बुलाया गया। यह स्पष्ट संदेश था कि यह कार्यक्रम वैश्विक न होकर स्थानीय भावनाओं से जुड़ा हुआ है। अयोध्या की 84 कोसी, 14 कोसी और पंच कोसी परिक्रमा से जुड़े लोगों को भी विशेष रूप से शामिल किया गया।


