बिहार : बिहार की सियासत इन दिनों सिर्फ नेताओं के बयानों से ही नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की एक बड़ी कार्रवाई से भी गर्म है। 2003 के बाद पहली बार बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया चली और अब इसकी फाइनल लिस्ट जारी हो चुकी है। ये लिस्ट मंगलवार को सामने आई और इसके साथ ही बिहार की वोटर लिस्ट में बड़ा फेरबदल दिखाई दिया है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं और इनके पीछे की राजनीति और सवाल भी उतने ही दिलचस्प। तो आज हम आपको विस्तार से समझाते हैं कि बिहार के मतदाताओं की नई लिस्ट में क्या-क्या बदला है और इस पर क्यों बवाल मच रहा है।
फाइनल लिस्ट जारी — 7.42 करोड़ वोटर्स बचे, 69 लाख नाम हटे
फाइनल SIR लिस्ट के मुताबिक, बिहार में वोटर्स की संख्या 6% घटकर 7.42 करोड़ रह गई है। यानी कुल 69.29 लाख नाम काट दिए गए हैं। वहीं, 21.53 लाख नए वोटर्स को जोड़ा गया है। अगर हम जून 2025 में जाएं, तो उस समय बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर्स थे। लेकिन पहले ड्राफ्ट लिस्ट आने के बाद ये आंकड़ा गिरकर 7.24 करोड़ रह गया। उस लिस्ट में करीब 65.63 लाख वोटर्स के नाम काटे गए थे। बाद में इनमें से 17 लाख नामों को फिर से शामिल किया गया।
नई फाइनल लिस्ट में साफ लिखा है कि 22.34 लाख लोग मृत पाए गए। 6.85 लाख वोटर्स के नाम दो जगह मिले और 36.44 लाख लोग अपने पुराने पते से शिफ्ट होकर दूसरी जगह बस चुके हैं। यानी चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए मृत, डुप्लीकेट और स्थानांतरित वोटर्स को हटाकर लिस्ट को क्लीन किया गया है।
पटना में वोटर्स बढ़े, सारण में सबसे ज्यादा कटौती
अब जरा जिलों पर नजर डालिए। पटना में मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। यहां 1 लाख 63 हजार 600 वोटर्स जुड़ गए। पहले पटना में 46 लाख 51 हजार 694 वोटर्स थे, लेकिन अब फाइनल रोल में 48 लाख 15 हजार 694 नाम दर्ज हैं। दूसरी तरफ सारण जिले में बड़ी कटौती हुई। यहां से 2 लाख 24 हजार 768 नाम लिस्ट से हट गए। पहले यहां 31 लाख 27 हजार वोटर्स थे, जो अब घटकर 29 लाख 2 हजार पर आ गए हैं।
SIR प्रक्रिया: मृत, डुप्लीकेट और शिफ्टेड वोटर्स की पहचान
SIR की प्रक्रिया जून 2025 से शुरू हुई थी। इसमें 7.89 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स से दोबारा फॉर्म भरवाए गए। 1 अगस्त को पहली लिस्ट आई, जिसमें 65 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए। ये लोग या तो मर चुके थे, या बिहार से बाहर स्थायी रूप से जा चुके थे, या फिर उनके पास दो वोटर आईडी थे। 24 जून से शुरू हुई इस प्रक्रिया को 25 जुलाई तक पूरा करना था और चुनाव आयोग का दावा है कि 99.8% कवरेज हासिल की गई।
आधार बना 12वां पहचान दस्तावेज, सुप्रीम कोर्ट का आदेश
शुरुआत में 11 दस्तावेज मान्य किए गए थे, लेकिन 8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आधार को भी वोटर की पहचान के लिए मान्य किया जाए। कोर्ट ने साफ कहा कि आधार पहचान का सबूत है, नागरिकता का नहीं। इसलिए चुनाव आयोग ने आधार को 12वां दस्तावेज मान लिया।
लेकिन इस पूरी कवायद पर विपक्ष सवाल उठा रहा है। विपक्ष का कहना है कि SIR के नाम पर मतदाताओं को वोटिंग अधिकार से वंचित किया जा रहा है। विपक्षी दलों का तर्क है कि 2003 के बाद से अब तक पांच चुनाव हो चुके हैं और अगर वोटर लिस्ट इतनी गड़बड़ थी, तो क्या वो सारे चुनाव गलत थे। उनका कहना है कि अगर SIR करना ही था, तो इसे चुनाव के बाद भी आराम से किया जा सकता था। अचानक जून के अंत में इसकी घोषणा कर, इतनी जल्दीबाजी में इसे पूरा करना, चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश है।
चुनाव आयोग का दावा
अब बड़ा सवाल है कि बिहार में ऐसा क्यों किया गया। चुनाव आयोग का कहना है कि ये प्रक्रिया सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहेगी। 18 सितंबर को आयोग ने बताया कि बिहार की तर्ज पर SIR पूरे देश में किया जाएगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि बाकी राज्यों में आधे से ज्यादा मतदाताओं को किसी नए दस्तावेज की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि उनकी पहचान पहले से ही लिस्ट में दर्ज है। वहां सिर्फ नए वोटर बनने वालों को डिक्लेरेशन फॉर्म भरना होगा और 1987 के बाद जन्मे लोगों को पेरेंट्स के दस्तावेज दिखाने होंगे।
कुल मिलाकर, बिहार की नई वोटर लिस्ट ने चुनावी तैयारी को और गर्म कर दिया है। एक तरफ चुनाव आयोग इसे पारदर्शिता और सफाई की कवायद बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे मतदाताओं को हटाने की साजिश कह रहा है। आने वाले दिनों में ये मुद्दा बिहार चुनाव की राजनीति को और भी धार दे सकता है। सवाल यही है कि क्या यह कदम बिहार के लोकतंत्र को मजबूत करेगा या फिर इसे लेकर विवाद और बढ़ेगा।


